उत्तराखंड में जब लोकगीत बने सत्ता के लिए चुनौती: कमीशन को मीट भात और ‘अब कथगा खैल्यू’ से निशंक सरकार तक, जनाक्रोश को आवाज देते रहे पहाड़ के गीत

रमेश पोखरियाल निशक सरकार के घोटालों खोलने पर हुआ गाना सुपरहिट

VOICE OF NATION EXCLUSIVE

देहरादून ( मनीष वर्मा) Voice of Nation Special Report

उत्तराखंड की राजनीति का इतिहास केवल विधानसभा, राजनीतिक दलों और चुनावी रैलियों में ही नहीं लिखा गया। पहाड़ के लोकगीत भी समय-समय पर ऐसी राजनीतिक आवाज बने, जिन्होंने सरकारों की कार्यप्रणाली, भ्रष्टाचार के आरोपों, बेरोजगारी, पलायन और आम जनता की नाराजगी को सीधे जनमानस तक पहुंचाया।

यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा कि किसी एक लोकगीत ने सीधे किसी मुख्यमंत्री को पद से हटा दिया, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि उत्तराखंड के कुछ राजनीतिक-व्यंग्य गीतों ने तत्कालीन सरकारों के खिलाफ बने जनमत और असंतोष को असाधारण रूप से प्रभावशाली आवाज दी।

इस परंपरा में लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी का नाम सबसे प्रमुखता से सामने आता है।

‘नौछामी नारायण’ — सत्ता पर लोकभाषा का तीखा व्यंग्य

उत्तराखंड के पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री एन.डी. तिवारी के कार्यकाल के दौरान आया ‘नौछामी नारायण’ केवल एक लोकगीत नहीं रहा। अपने व्यंग्य, प्रतीकों और राजनीतिक कटाक्ष के कारण यह पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गया।

 

 

गीत ने यह दिखाया कि पहाड़ की भाषा में कही गई बात कभी-कभी राजनीतिक भाषणों से कहीं अधिक तेजी से जनता तक पहुंच सकती है।

निशंक सरकार पर आरोपों की बौछार और लोकगीतों में फूटा जनाक्रोश

रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ का मुख्यमंत्री कार्यकाल उत्तराखंड की राजनीति के सबसे विवादित दौरों में गिना गया, जब उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के अनेक गंभीर आरोप विपक्ष, मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर लगातार उठे। सिटुर्जिया (Sturdia/Citurgia) भूमि प्रकरण, 56 जलविद्युत परियोजनाओं के आवंटन को लेकर उठा विवाद और महाकुंभ से जुड़े कथित वित्तीय अनियमितताओं के आरोप उस समय प्रदेश की राजनीति में बड़े मुद्दे बने। हालात यहां तक पहुंचे कि 56 हाइड्रो प्रोजेक्ट्स रद्द किए गए, जबकि सिटुर्जिया प्रकरण भी न्यायिक जांच-पड़ताल और तीखे राजनीतिक विवाद का विषय बना। इन्हीं परिस्थितियों में नरेंद्र सिंह नेगी के व्यंग्यात्मक गीतों ने जनता के बीच पहले से मौजूद नाराजगी को पहाड़ की भाषा में स्वर दिया। ‘कमिशन की मीट-भात’ जैसे गीत उस दौर में भ्रष्टाचार के आरोपों पर एक तीखे सांस्कृतिक कटाक्ष के रूप में देखे गए। अंततः सितंबर 2011 में भाजपा ने निशंक को मुख्यमंत्री पद से हटाकर बी.सी. खंडूरी को कमान सौंपी; उस समय की मीडिया रिपोर्टों ने भी भ्रष्टाचार के आरोपों से प्रभावित उनकी सरकार की छवि को इस राजनीतिक बदलाव का महत्वपूर्ण संदर्भ बताया था‘अब कथगा खैल्यू’ — निशंक सरकार के दौर में भ्रष्टाचार के आरोपों पर तीखा प्रहार

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इसके बाद वर्ष 2010 के आसपास नरेन्द्र सिंह नेगी का ‘अब कथगा खैल्यू’ — अर्थात ‘अब कितना खाओगे?’ सामने आया।

यह वह समय था जब तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के नेतृत्व वाली सरकार विपक्ष और आलोचकों के निशाने पर थी। सरकार के कार्यकाल में विभिन्न परियोजनाओं और फैसलों को लेकर गंभीर राजनीतिक आरोप और विवाद उठे। Citurgia भूमि प्रकरण तथा जलविद्युत/पावर प्रोजेक्ट आवंटन से जुड़े विवादों को लेकर भी विपक्ष ने सरकार पर तीखे हमले किए।

इन मामलों को लेकर आरोप-प्रत्यारोप और राजनीतिक विवाद इतने व्यापक हुए कि निशंक सरकार की सार्वजनिक छवि पर भी सवाल उठने लगे। ऐसे वातावरण में ‘अब कथगा खैल्यू’ जनता के बीच तेजी से लोकप्रिय हुआ और भ्रष्टाचार के खिलाफ जनभावना का सांस्कृतिक प्रतीक बन गया।

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है—इन विवादों में लगाए गए राजनीतिक आरोपों को न्यायिक रूप से सिद्ध अपराध मान लेना उचित नहीं होगा। लेकिन यह भी उत्तराखंड के राजनीतिक इतिहास का हिस्सा है कि उस दौर में भ्रष्टाचार के आरोप सरकार के खिलाफ प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बने और निशंक को तीखी सार्वजनिक तथा विपक्षी आलोचना का सामना करना पड़ा।

क्या एक गीत ने मुख्यमंत्री बदल दिया?

इस प्रश्न का उत्तर राजनीतिक दृष्टि से ‘नहीं’, लेकिन सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से कहीं अधिक दिलचस्प है।

मुख्यमंत्री बदलने का औपचारिक निर्णय राजनीतिक दल, विधायक दल और पार्टी नेतृत्व करते हैं। किसी गीत को मुख्यमंत्री परिवर्तन का प्रत्यक्ष कारण बताने का कोई ठोस आधार नहीं है।

लेकिन लोकगीत जनता की नाराजगी को एक भाषा, एक धुन और एक नारा दे सकता है।

और उत्तराखंड में यही हुआ।

जब राजनीतिक आरोप लंबे दस्तावेजों और भाषणों में सीमित थे, तब एक साधारण सवाल—

“अब कथगा खैल्यू?” कमीशन को मीट भात इस प्रकार फ़िल्माया गया की जैसे साक्षात निशंक बैठे हो और उनके स्टाफ मनवीर  चौहान आदि भी सही मिलते जुलती शकल के लिए गए और निशंक की केंद्र की शिक्षा मंत्री रहते बिजिलेंस जांच चल रही है तथा मोदी की नाराजगी से बंगला भी ख़ाली करवाने के बाद निशंक की राजनीति ठंडे बस्ते में चाकी गई और मनवीर चौहान जैसे पैसे की लें देन करने वाले उनके भ्रष्ट ओएसडी की भाजपा में प्रवक्ता बना दिया गया जिससे पार्टी की छवि धूमिल हुई और आगे क्या होगा यह ईश्वर जानता है और क्या क्या खुलासे होंगे रिकॉर्डिंग के ?

—पहाड़ के गांवों, बाजारों और आम बातचीत तक पहुंच गया।

पवन सेमवाल और विरोध की अगली पीढ़ी ज़ेन Zee

यह परंपरा बाद के वर्षों में भी समाप्त नहीं हुई।

पवन सेमवाल जैसे कलाकारों ने भी अपने गीतों के माध्यम से उत्तराखंड की सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं को उठाया। ‘उत्तराखंडी जागी जावा’ जैसे गीतों में महिला सुरक्षा और शासन-व्यवस्था से जुड़े सवाल सामने आए।

इसी तरह बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और व्यवस्था को लेकर बने अन्य राजनीतिक-व्यंग्य गीतों ने दिखाया कि उत्तराखंड में लोकसंगीत आज भी केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि जनसंवाद और विरोध का माध्यम है।

पहाड़ में गीत क्यों बन जाता है राजनीतिक हथियार?

उत्तराखंड की परिस्थितियां दूसरे राज्यों से कुछ अलग हैं। दूर-दराज के गांव, पलायन, रोजगार की कमी, प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार, महिलाओं की भूमिका और पहाड़ बनाम मैदान की विकास संबंधी बहस यहां दशकों से राजनीति के केंद्र में रही है।

लोक कलाकार जब इन्हीं मुद्दों को गढ़वाली या कुमाऊंनी में उठाता है, तो संदेश सीधे स्थानीय समाज तक पहुंचता है।

यही कारण है कि उत्तराखंड में कभी-कभी एक लोकगीत वह सवाल पूछ देता है जिसे राजनीतिक विपक्ष महीनों तक उठाने के बावजूद उतनी प्रभावी तरीके से जनता तक नहीं पहुंचा पाता।

सत्ता नहीं बदलता गीत, लेकिन सत्ता के खिलाफ माहौल बदल सकता है

उत्तराखंड की राजनीति का यह अनूठा अध्याय बताता है कि लोकतंत्र में जनमत केवल चुनावी मंचों पर नहीं बनता।

कभी अखबार सवाल उठाता है।
कभी सड़क पर आंदोलन होता है।
और पहाड़ में कभी-कभी ढोल-दमाऊ और लोकगायक की आवाज सत्ता से सबसे कठिन सवाल पूछ देती है।

नरेन्द्र सिंह नेगी के ‘नौछामी नारायण’ से लेकर ‘अब कथगा खैल्यू’ और बाद के राजनीतिक लोकगीतों तक एक बात स्पष्ट दिखाई देती है—उत्तराखंड का लोकसंगीत अपने समय की राजनीति का आईना भी रहा है और जनता के असंतोष की आवाज भी।

सवाल आज भी वही है—क्या सरकारें लोकगीतों को केवल मनोरंजन समझेंगी, या उनके पीछे छिपी जनता की आवाज भी सुनेंगी?

— Voice of Nation | Exclusive Political & Cultural Report

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