क्या 54 वोटों की हार अब जीत में बदलने वाली है?
महिला आरक्षण पर बदलता संसद गणित, विपक्ष में बढ़ी बेचैनी!
विशेष विश्लेषण | वॉयस ऑफ नेशन
नई दिल्ली।
कुछ महीने पहले तक जो महिला आरक्षण विधेयक संसद में 54 वोटों से अटक गया था, वही मुद्दा अब नए राजनीतिक समीकरणों के कारण फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है।
उस समय विपक्ष की एकजुटता ने सरकार को आवश्यक दो-तिहाई बहुमत से दूर रखा था। लेकिन आज तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है।
राज्यसभा में आम आदमी पार्टी को बड़ा झटका लगा जब उसके 7 सांसदों ने पार्टी से अलग होकर भाजपा का दामन थाम लिया। इससे न केवल विपक्षी खेमे की संख्या प्रभावित हुई बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में नए समीकरणों की शुरुआत भी हुई।
दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस के भीतर भी उठापटक की खबरों ने दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं को और तेज कर दिया है। टीएमसी के कई सांसदों की लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से से हुई मुलाकात और लोकसभा में बदलते समूहों और नई राजनीतिक निष्ठाओं को लेकर लगातार अटकलें लगाई जा रही हैं।और आज शिव सेना यूबीटी ग्रुप के 9 में से 5 साँसद लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मुलाक़ात करने वाले है ।
क्या महिला आरक्षण बनेगा भाजपा का सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि सरकार संसद में आवश्यक समर्थन जुटाने में सफल रहती है तो महिला आरक्षण विधेयक की वापसी असंभव नहीं मानी जा सकती।
2027 के विधानसभा चुनाव और 2029 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए महिला मतदाता भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा प्रभावशाली वर्ग बन चुके हैं। ऐसे में महिलाओं को बड़े पैमाने पर राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने का संदेश चुनावी राजनीति की दिशा बदल सकता है।
54 वोटों की दूरी अब कितनी रह गई?
यही वह सवाल है जिसकी चर्चा सत्ता के गलियारों से लेकर विपक्षी दलों के रणनीतिक कमरों तक हो रही है।
यदि संसद का अंकगणित इसी प्रकार बदलता रहा तो वह विधेयक, जो कुछ महीने पहले असंभव माना जा रहा था, आने वाले समय में भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा गेम-चेंजर साबित हो सकता है।
महिला आरक्षण अब केवल एक विधेयक नहीं, बल्कि 2027 और 2029 की चुनावी राजनीति का संभावित निर्णायक मुद्दा बनता जा रहा है।
दिल्ली में चर्चा है कि आने वाले मानसून सत्र पर पूरे देश की नजर रहेगी, क्योंकि यहीं से भारतीय राजनीति का अगला बड़ा अध्याय शुरू हो सकता है।
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