Mandal से बदला सत्ता का सामाजिक गणित; ब्राह्मण, ठाकुर, OBC, दलित, जाट, यादव और गुर्जर बने चुनावी समीकरण—लेकिन सिनेमा से सियासत तक विवाहों ने धर्म और समुदाय की सीमाएं पार कीं
🇮🇳 VOICE OF NATION SPECIAL | TIRANGA YATRA 2026
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जातियों में उलझी सियासत, रिश्तों ने तोड़ीं दीवारें—और तिरंगा सबको जोड़ता रहा
Mandal से बदला सत्ता का सामाजिक गणित; ब्राह्मण, ठाकुर, OBC, दलित, जाट, यादव और गुर्जर बने चुनावी समीकरण—लेकिन सिनेमा से सियासत तक विवाहों ने धर्म और समुदाय की सीमाएं पार कीं
नई दिल्ली | ( Manish Verma ) Voice of Nation Special Report
जब देश स्वतंत्रता दिवस की ओर बढ़ते हुए तिरंगा यात्राओं में उमड़ रहा है, तब Voice of Nation एक ऐसा सवाल उठा रहा है जो आजादी के लगभग आठ दशकों बाद भी भारतीय राजनीति के केंद्र में मौजूद है—
हम भारतीय पहले हैं या हमारी जाति और धर्म की पहचान पहले है?
आज हर राजनीतिक दल सामाजिक समीकरण साधता है। कहीं ब्राह्मण सम्मेलन होता है, कहीं दलित और OBC outreach, कहीं जाट-गुर्जर समीकरण की चर्चा होती है तो कहीं यादव, कुर्मी, राजपूत या अन्य समुदाय चुनावी रणनीति का केंद्र बनते हैं।
लेकिन इस कहानी का दूसरा पहलू कहीं अधिक दिलचस्प है।
जिस भारत की राजनीति जातियों का हिसाब लगाती रही, उसी भारत में लाखों परिवारों ने विवाह, मित्रता, कारोबार, सेना, खेल और संस्कृति के माध्यम से उन सीमाओं को लगातार तोड़ा भी है।
1990: Mandal और भारतीय राजनीति का Turning Point
V.P. Singh सरकार द्वारा 1990 में Mandal Commission की सिफारिशों के आधार पर केंद्रीय सरकारी नौकरियों में OBC के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की घोषणा स्वतंत्र भारत के सबसे विवादास्पद राजनीतिक फैसलों में रही।
इसके खिलाफ जबरदस्त छात्र आंदोलन हुए। आत्मदाह के प्रयासों ने पूरे देश को झकझोर दिया। समाज के एक हिस्से में V.P. Singh के प्रति भारी नाराजगी पैदा हुई।
दूसरी ओर Mandal समर्थकों के लिए यही फैसला पिछड़े वर्गों को प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय दिलाने की ऐतिहासिक शुरुआत था।
यानी जिस Mandal को एक भारत ने सामाजिक न्याय कहा, दूसरे भारत ने उसी को सामाजिक विभाजन और अवसरों पर चोट के रूप में देखा।
यहीं से caste arithmetic भारतीय चुनावी राजनीति की सबसे बड़ी शक्तियों में से एक बनता चला गया।
Mandal के बाद Social Engineering
आने वाले दशकों में लगभग हर बड़े राजनीतिक दल ने अपना सामाजिक गठबंधन बनाने की कोशिश की।
ब्राह्मण, ठाकुर/राजपूत, यादव, जाट, गुर्जर, कुर्मी, दलित, अति-पिछड़ा और अन्य OBC समूह राजनीतिक रणनीति में महत्वपूर्ण होते गए।
यहां तक कि मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष, मंत्रिमंडल और टिकट वितरण पर चर्चा करते समय भी अक्सर सवाल उठता है—किस समुदाय को कितना प्रतिनिधित्व मिला?
BJP ने भी समय के साथ अपने पारंपरिक सामाजिक आधार से आगे निकलकर OBC, दलित और विभिन्न क्षेत्रीय समुदायों में विस्तार किया। दूसरी ओर ब्राह्मण और अन्य सवर्ण समुदाय भी उसके महत्वपूर्ण समर्थन आधार का हिस्सा बने रहे।
इसलिए किसी एक जाति को भाजपा की पूरी राजनीति का लाभार्थी या पीड़ित घोषित कर देना वास्तविकता को अत्यधिक सरल बना देगा।
लेकिन सवाल कायम है—क्या भारत में राजनीतिक योग्यता के साथ जातीय उपयोगिता भी सत्ता की सीढ़ी तय करती है?
फिर Bollywood की तरफ देखिए—तस्वीर बदल जाती है
राजनीति जहां समाज को अलग-अलग electoral blocks में देखती है, वहीं भारतीय सिनेमा के अनेक चर्चित परिवार धार्मिक और सांस्कृतिक सीमाओं के पार बने।
नसीरुद्दीन शाह–रत्ना पाठक शाह, आमिर खान–रीना दत्ता, आमिर खान–किरण राव, इरफान खान–सुतापा सिकदर, सैफ अली खान–अमृता सिंह, सैफ अली खान–करीना कपूर, अरबाज खान–मलाइका अरोड़ा, फरदीन खान–नताशा माधवानी और जायद खान–मलाइका पारेख जैसे विवाह भारतीय समाज के इसी दूसरे पहलू को सामने रखते हैं।
इनमें कुछ रिश्ते बाद में समाप्त भी हुए, लेकिन उनका सामाजिक महत्व इससे समाप्त नहीं होता—अलग धार्मिक या सांस्कृतिक पारिवारिक पृष्ठभूमियों के दो लोगों ने एक समय परिवार बनाने का निर्णय लिया।
और शायद नसीरुद्दीन शाह और रत्ना पाठक शाह इसका सबसे दिलचस्प उदाहरण हैं। Ratna Pathak Shah सार्वजनिक रूप से अपने inter-faith marriage पर बात कर चुकी हैं और उन्होंने बताया कि उनसे धर्म परिवर्तन करने को नहीं कहा गया था।
राजनीति में भी रिश्ते जातीय गणित से बड़े निकले
ऐसे उदाहरण केवल फिल्मी पर्दे पर नहीं हैं।
उमर अब्दुल्ला–पायल नाथ, सचिन पायलट–सारा अब्दुल्ला, शाहनवाज हुसैन–रेणु शर्मा और मुख्तार अब्बास नकवी–सीमा नकवी जैसे रिश्ते भी भारतीय राजनीति के सामाजिक ताने-बाने का अलग पहलू दिखाते हैं।
सचिन पायलट और सारा अब्दुल्ला का रिश्ता तो दो बेहद चर्चित राजनीतिक परिवारों को जोड़ता था—एक तरफ राजस्थान का Pilot परिवार और दूसरी ओर जम्मू-कश्मीर का Abdullah परिवार।
यानी जिन राजनीतिक मंचों पर समाज को अलग-अलग जातीय और धार्मिक voter groups में समझा जाता है, उन्हीं राजनीतिक परिवारों में व्यक्तिगत रिश्ते कई बार इन सीमाओं को पार करते दिखाई देते हैं।
यही है भारत का सबसे दिलचस्प विरोधाभास
राजनीति ने पूछा—अगड़ा या पिछड़ा?
रिश्तों ने पूछा—क्या हम एक-दूसरे को समझते हैं?
राजनीति ने पूछा—हिंदू या मुस्लिम?
परिवार ने कहा—हम भारतीय हैं।
चुनावी रणनीति ने पूछा—ब्राह्मण, ठाकुर, यादव, जाट, गुर्जर, OBC या दलित?
तिरंगे ने इनमें से कोई सवाल नहीं पूछा।
और शायद इसी जगह Mandal की कहानी, caste politics, Bollywood और political families—चारों अलग-अलग विषय एक ही जगह आकर मिलते हैं।
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TIRANGA YATRA: सियासत के समीकरण अनेक, भारत एक
तिरंगा यात्रा का अर्थ केवल हजारों लोगों का राष्ट्रीय ध्वज लेकर सड़क पर निकलना नहीं होना चाहिए।
इसका अर्थ उस साझा पहचान को स्वीकार करना भी है जो हमारे तमाम मतभेदों से बड़ी है।
Mandal पर देश आज भी असहमत हो सकता है। आरक्षण पर बहस हो सकती है। राजनीतिक दल caste equations बना सकते हैं। सामाजिक प्रतिनिधित्व पर सवाल उठाए जा सकते हैं।
लेकिन तिरंगे पर कोई आरक्षण नहीं है।
उसमें ब्राह्मण के लिए अलग रंग नहीं।
ठाकुर के लिए अलग नहीं।
OBC या दलित के लिए अलग नहीं।
हिंदू के लिए अलग तिरंगा नहीं और मुस्लिम के लिए दूसरा नहीं।
तिरंगा केवल एक है—क्योंकि भारत एक है।
VOICE OF NATION का TIRANGA YATRA संदेश
“Mandal से लेकर आज की caste politics तक सियासत ने हमें कई खांचों में गिना। हमारे परिवारों और रिश्तों ने उन्हीं दीवारों को बार-बार पार किया। अब तिरंगा यात्रा हमें याद दिलाती है—हमारी पहचानें अनेक हो सकती हैं, लेकिन हमारी राष्ट्रीय पहचान एक है।”
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जातियां अनेक। धर्म अनेक। भाषाएं अनेक। विचार अनेक। तिरंगा एक। भारत एक।
VOICE OF NATION SPECIAL — TIRANGA YATRA 2026
“तिरंगे से बड़ी कोई जाति नहीं, भारत से बड़ा कोई समीकरण नहीं।”
Jai Hind