राज्यसभा की एक सीट और दो पुराने ‘खिलाड़ी’: बहुगुणा की दिल्ली वापसी की चर्चा के बीच क्या हरदा खोलेंगे पुराने OSD की फाइलें?

क्या उत्तराखंड से किसी ‘बाहरी’ बड़े चेहरे को राज्यसभा भेजकर चौंका सकती है BJP?

देहरादून | Voice of Nation Special , By Editor in Chief, Manish Verma | 1.10.2026 | 4:00 AM IST

उत्तराखंड की एक राज्यसभा सीट का चुनाव नजदीक है और भाजपा में उम्मीदवार को लेकर मंथन शुरू हो चुका है। मौजूदा सांसद नरेश बंसल का कार्यकाल 25 नवंबर को समाप्त हो रहा है। चुनाव आयोग ने 16 अक्टूबर को मतदान तय किया है और नामांकन 29 सितंबर से शुरू होंगे। 

उत्तराखंड राज्यसभा सीट 2026 को लेकर BJP उम्मीदवार की चर्चा, संसद भवन, उत्तराखंड और राजनीतिक समीकरण दर्शाती Voice of Nation की विशेष रिपोर्ट

इसी सियासी हलचल के बीच पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा का नाम भी राजनीतिक चर्चाओं में जोड़ा जा रहा है। उनके समर्थक खेमे में उनकी सक्रिय भूमिका को लेकर चर्चा है। लेकिन अभी भाजपा ने उत्तराखंड सीट के लिए उम्मीदवार घोषित नहीं किया है और उपलब्ध विश्वसनीय सार्वजनिक स्रोतों से यह प्रमाणित नहीं होता कि बहुगुणा या उनका परिवार राज्यसभा टिकट के लिए किसी औपचारिक “सौदेबाजी” में शामिल है।

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मगर कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

उत्तराखंड की राजनीति के दूसरे पुराने खिलाड़ी हरीश रावत के सामने इस समय ED की जांच खड़ी है। उनके पूर्व OSD और वर्तमान निजी सहायक चंदन सिंह जीना के यहां ED की कार्रवाई के बाद जांच रावत तक पहुंच चुकी है। शनिवार को ED ने उनसे करीब छह घंटे पूछताछ की और पुराने आयकर रिटर्न के साथ परिवार तथा संपत्तियों से संबंधित दस्तावेज मांगे। 

बहुगुणा बनाम रावत: हिसाब बहुत पुराना है

उत्तराखंड की नई पीढ़ी भले इस राजनीतिक इतिहास को भूल गई हो, लेकिन दोनों नेताओं का टकराव नया नहीं है।

2012 में विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री बने। फरवरी 2014 में कांग्रेस हाईकमान ने नेतृत्व परिवर्तन किया और हरीश रावत ने बहुगुणा की जगह मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली।

फिर 2016 आया।

कांग्रेस में हुई बगावत के प्रमुख चेहरों में विजय बहुगुणा शामिल थे। रावत सरकार संकट में आई और बहुगुणा बाद में भाजपा में चले गए।

इसके बाद दोनों तरफ से आरोपों की ऐसी बौछार हुई जिसकी गूंज आज भी पुराने राजनीतिक रिकॉर्ड में मौजूद है।

हरदा ने लगाया था ₹25 करोड़ का आरोप, बहुगुणा ने भेज दिया कानूनी नोटिस

2016 में हरीश रावत ने आरोप लगाया था कि उनकी सरकार गिराने के लिए भाजपा ने विजय बहुगुणा को ₹25 करोड़ दिए।

बहुगुणा ने इसे झूठा और आधारहीन बताया और रावत को मानहानि का नोटिस भेज दिया। उन्होंने तीन दिन के भीतर बिना शर्त माफी की मांग की थी। 

यानी आज जिन दो नेताओं के नाम फिर राजनीतिक गलियारों में साथ-साथ सुनाई दे रहे हैं, उनके बीच सामान्य राजनीतिक मतभेद नहीं रहे हैं।

कभी मुख्यमंत्री की कुर्सी बदली, फिर सरकार गिरने की नौबत आई, फिर स्टिंग सामने आया और फिर ₹25 करोड़ जैसे आरोप लगे।

अब हरदा के OSD पर ED का वार

दस साल बाद कहानी ने नया मोड़ लिया।

ED ने हरीश रावत के पूर्व OSD चंदन सिंह जीना के परिसर पर छापा मारा। एजेंसी के अनुसार वहां से ₹32 लाख नकद, करीब 200.5 ग्राम सोना और 12 महंगी घड़ियां मिलीं। जीना और उनके परिवार से जुड़े खातों में ₹52.16 लाख फ्रीज किए गए और एजेंसी ने जब्त/फ्रीज संपत्तियों का तत्कालीन कुल मूल्य करीब ₹1.28 करोड़ बताया। 

रावत ने जीना का बचाव किया। उन्होंने कहा कि जीना उनके विश्वसनीय सहयोगी रहे हैं और OMR शीट में छेड़छाड़ के आरोप पर उन्हें विश्वास नहीं है। 

इसके बाद ED ने रावत को भी बुला लिया।

अब एजेंसी ने उनके पुराने आयकर रिटर्न और पारिवारिक संपत्तियों तक की जानकारी मांगी है। 

सवाल: क्या अब बहुगुणा शासन के OSD और पुराने सत्ता तंत्र की फाइलें निकलेंगी?

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यहीं इस कहानी का अगला राजनीतिक मोड़ छिपा है।

हरीश रावत लगभग आधी सदी से उत्तराखंड और राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय रहे हैं। विजय बहुगुणा भी मुख्यमंत्री रहे हैं। दोनों एक-दूसरे के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी रहे और 2016 में तो यह लड़ाई खुलकर सामने आ गई थी।

इसलिए राजनीतिक गलियारों में स्वाभाविक सवाल है :

यदि रावत शासन के तत्कालीन OSD की भूमिका की जांच हो सकती है, तो क्या बहुगुणा शासनकाल के तत्कालीन OSD, सलाहकारों और सत्ता से जुड़े दूसरे लोगों के पुराने फैसले और रिकॉर्ड भी सार्वजनिक बहस में आएंगे?

इस समय ऐसी किसी आगामी कार्रवाई अथवा रावत द्वारा बहुगुणा खेमे के खिलाफ दस्तावेज तैयार किए जाने की स्वतंत्र पुष्टि नहीं है। लेकिन पुराना रिकॉर्ड इतना जरूर बताता है कि दोनों नेता पहले एक-दूसरे के खिलाफ गंभीर आरोप सार्वजनिक कर चुके हैं।

और राजनीति में एक पुराना खिलाड़ी दूसरे पुराने खिलाड़ी की राजनीति से अनजान हो—यह मानना भी आसान नहीं।

इधर ED, उधर राज्यसभा

समय ने इस कहानी को और दिलचस्प बना दिया है।एक तरफ हरीश रावत ED के सवालों का सामना कर रहे हैं।

दूसरी तरफ उत्तराखंड की राज्यसभा सीट खाली होने जा रही है। चुनाव की तारीख घोषित हो चुकी है और भाजपा उम्मीदवार पर मंथन कर रही है। 

ऐसे में यदि विजय बहुगुणा वास्तव में राज्यसभा दावेदारी में औपचारिक रूप से सामने आते हैं, तो यह घटनाक्रम और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाएगा। फिलहाल उनके टिकट या किसी सौदेबाजी की पुष्टि नहीं हुई है।

‘एक खिलाड़ी दूसरे खिलाड़ी की पूरी खबर रखता है’

उत्तराखंड की राजनीति में रावत और बहुगुणा दोनों लंबे समय तक सत्ता के शीर्ष पर रहे हैं।

दोनों कांग्रेस में साथ भी रहे।

दोनों के अपने-अपने सत्ता केंद्र रहे।

बहुगुणा की जगह रावत मुख्यमंत्री बने।फिर बहुगुणा रावत-विरोधी बगावत का चेहरा बने।
रावत ने ₹25 करोड़ का आरोप लगाया।
बहुगुणा ने मानहानि नोटिस भेजा।
और अब रावत के पूर्व OSD पर ED कार्रवाई हो चुकी है।

इसलिए अगला बड़ा राजनीतिक सवाल यह है कि क्या ED की जांच का जवाब केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहेगा, या पुराने शासनकालों की फाइलें भी राजनीतिक हथियार बनेंगी?

यदि बहुगुणा शासन से जुड़े पुराने OSD या अन्य अधिकारियों के संबंध में कोई प्रमाणित दस्तावेज सामने आता है तो कहानी सीधे नया मोड़ ले सकती है।

और तब सवाल सिर्फ “रावत बनाम बहुगुणा” नहीं रहेगा।

सवाल भाजपा के लिए भी होगा—यदि उसके अपने वरिष्ठ नेता के पुराने मुख्यमंत्री कार्यकाल से जुड़ा कोई सत्यापित मामला सार्वजनिक होता है, तो पार्टी उसका राजनीतिक जवाब कैसे देगी?

फिलहाल एक तरफ ED की जांच दस्तावेज मांग रही है और दूसरी तरफ राज्यसभा की घड़ी चल चुकी है।

उत्तराखंड की पुरानी सियासी शतरंज पर मोहरे फिर सज रहे हैं—लेकिन अगली चाल किसकी होगी, इसका जवाब दस्तावेज और आने वाले राजनीतिक घटनाक्रम ही देंगे।

क्या उत्तराखंड से किसी ‘बाहरी’ बड़े चेहरे को राज्यसभा भेजकर चौंका सकती है BJP?

उत्तराखंड की एकमात्र खाली होने जा रही राज्यसभा सीट को लेकर भाजपा में मंथन अब निर्णायक दौर में पहुंच गया है। प्रदेश भाजपा ने स्थानीय दावेदारों के नाम हाईकमान को भेज दिए हैं, लेकिन अंतिम फैसला दिल्ली में होना है। ताजा रिपोर्ट के अनुसार लगभग 25 नामों में से 9 नाम शॉर्टलिस्ट करके केंद्रीय नेतृत्व को भेजे गए हैं। 

यही वह बिंदु है जहां इस चुनाव में एक दूसरा और ज्यादा दिलचस्प राजनीतिक समीकरण उभरता है।

क्या जरूरी है कि भाजपा उत्तराखंड से उत्तराखंड के ही किसी नेता को राज्यसभा भेजे?

संवैधानिक रूप से ऐसा कोई बंधन नहीं है। राज्यसभा उम्मीदवार का उसी राज्य का निवासी होना आवश्यक नहीं है। इसलिए अंतिम समय में भाजपा हाईकमान किसी राष्ट्रीय नेता अथवा दूसरे राज्य से जुड़े राजनीतिक चेहरे को उत्तराखंड से उम्मीदवार बनाता है तो इसे नियमों के लिहाज से असामान्य नहीं माना जाएगा।

प्रदेश ने भेजे नाम, लेकिन आखिरी मुहर दिल्ली की

25 सितंबर की भाजपा कोर कमेटी की बैठक में करीब 24 दावेदारों के नाम सामने आए थे। इनमें महिलाओं, युवाओं, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति सहित अलग-अलग वर्गों के नेता शामिल थे। अंतिम पैनल तैयार करने की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट और प्रदेश महामंत्री संगठन फणींद्रनाथ शर्मा को दी गई। 

इसके बाद अलग-अलग रिपोर्टों में हाईकमान को भेजे गए नामों की संख्या को लेकर अंतर है—दैनिक जागरण ने 15 नामों की सूची भेजे जाने की खबर दी, जबकि लाइव हिन्दुस्तान की 29 सितंबर की रिपोर्ट में नौ नाम शॉर्टलिस्ट किए जाने की बात कही गई है। इसलिए अंतिम आधिकारिक पैनल सार्वजनिक होने तक किसी एक संख्या को अंतिम नहीं माना जा सकता। 

गणेश गोदियाल  ने  कहा कांग्रेस वॉकओवर नहीं देगी ।

हालांकि कांग्रेस की विधायक संख्या 36 (जीत के लिए आवश्यक) विधान सभा में नहीं है परंतु  ऑंग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने एक बात बहुत अच्छी कही की हम वॉकओवर नहीं देंगे क्यूंकि यह लोकतंत्र है और विपक्ष मजबूती के साथ मौजूद है ठीक इस प्रकार का जोश भगत सिंह कोशियारी के राज्यसभा चुनाव में भी हुआ था जब वॉयस ऑफ़ नेशन के समूह संपादक और पूर्व राज्यमंत्री मनीष वर्मा ने कोशियारी के ख़िलाफ़ 28 विधायकों के समर्थन से निर्दलीय राज्यसभा का पर्चा भर दिया था और लगभग खंडूरी से नाराज़ चल रहे विधायकों  का समर्थन लेने की बात भी बन गई थी परंतु उस समय डर के मारे की मनीष बर्मा राज्यसभा चले गए तो प्रमाणित होंजायेगा की सरकार अल्पमत में है और सरकार ना गिर जाए  इसलिए तो खंडूरी ने रातो रातो 32 विधायकों को लाल बत्ती विधायकों बाँट दी थी  और कांग्रेस हाईकमान ने वॉकओवर दे दिया था ।

2027 का चुनाव स्थानीय चेहरे के पक्ष में बड़ा तर्क

स्थानीय उम्मीदवार के पक्ष में सबसे बड़ा राजनीतिक तर्क 2027 का उत्तराखंड विधानसभा चुनाव है।

गढ़वाल-कुमाऊं संतुलन, सामाजिक प्रतिनिधित्व और संगठन के पुराने कार्यकर्ताओं की अपेक्षाएं टिकट तय करते समय महत्वपूर्ण हो सकती हैं। भाजपा की प्रदेश कोर कमेटी की बैठक में भी विधानसभा चुनाव की रणनीति, बूथ मजबूती और लगातार तीसरी बार सरकार बनाने के लक्ष्य पर चर्चा हुई। 

उत्तराखंड से वर्तमान तीनों राज्यसभा सांसद—नरेश बंसल, कल्पना सैनी और महेंद्र भट्ट—भाजपा से हैं। 

इसलिए स्थानीय संगठन स्वाभाविक रूप से चाहेगा कि राज्य की सीट पर उत्तराखंड के नेता को ही अवसर मिले। भाजपा के नामो में विश्वास डाबर,रुहैला, पुनीत मित्तल,अनिल गोयल ,विनय गोयल, और इसके अलावा यदि एंटी इंकम्बेंसी पर हाईकमान चुनाव से पहले फैसला लेता है कुमाऊ से 7 वी बार विधायक,पूर्व भाजपा अध्यश,4 बार कैबिनेट मंत्री रहे बिशन सिंह चुफाल (मुख्यमन्त्री के नाम की लिस्ट में भी शामिल है )

लेकिन क्या दिल्ली के पास कोई ‘सरप्राइज कार्ड’ है?

यहीं से राजनीतिक अटकलों का दूसरा दरवाजा खुलता है।

राज्यसभा केवल प्रदेश की राजनीति का माध्यम नहीं है। राष्ट्रीय दल इन सीटों का इस्तेमाल अपने केंद्रीय राजनीतिक और संसदीय समीकरणों के लिए भी करते रहे हैं।

इसलिए उत्तराखंड से किसी राष्ट्रीय स्तर के भाजपा नेता को उतारने की संभावना को तब तक पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता, जब तक केंद्रीय नेतृत्व उम्मीदवार घोषित नहीं कर देता।

लेकिन एक और संभावना राजनीतिक विश्लेषण में जोड़ी जा सकती है।

क्या किसी सहयोगी या हाल में साथ आए बड़े नेता को मिल सकता है उत्तराखंड का टिकट?

यदि भाजपा केंद्रीय स्तर पर अपने किसी सहयोगी दल के साथ राजनीतिक संतुलन साधना चाहे, अथवा हाल के वर्षों में दूसरे राजनीतिक दल से भाजपा या उसके व्यापक राजनीतिक खेमे में आए किसी बड़े नेता को संसद में स्थान देना चाहे, तो उत्तराखंड की सुरक्षित मानी जा रही सीट ऐसा माध्यम बन सकती है।

यह फिलहाल संभावना और राजनीतिक विश्लेषण है भाजपा की ओर से ऐसा कोई आधिकारिक संकेत सामने नहीं आया है।

फिर भी राष्ट्रीय राजनीति के संदर्भ में इसे पूरी तरह नजरअंदाज करना जल्दबाजी होगी। यदि केंद्रीय मंत्रिमंडल या भाजपा के राष्ट्रीय संगठन में आगे कोई पुनर्संतुलन होना हो, तो राज्यसभा की सीटें राष्ट्रीय नेतृत्व के लिए राजनीतिक समायोजन का एक रास्ता बन सकती हैं।

ऐसी स्थिति में तीन तरह के विकल्प सामने हो सकते हैं

उत्तराखंड का संगठनात्मक चेहरा, कोई बड़ा राष्ट्रीय भाजपा नेता, या व्यापक राजनीतिक समीकरण में उपयोगी कोई सहयोगी/नया राजनीतिक चेहरा। पर कुल मिलाकर देखा जाए तो भाजपा किसी पूर्व विवादित मुख्यमंत्री या दागी चेहरे को राज्यसभा भेजने से अच्छा अपने साथ हाल ही में कई पार्टी छोड़ कर आए कई  नेताओं को उनकी पार्टी का समर्थन लेने के लिए राज्यसभा भेजगी ऐसी पार्टी में चर्चा चल रहो है

बहुगुणा का नाम भी इसी चर्चा को बनाता है दिलचस्प

यहीं पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को लेकर चल रही राजनीतिक चर्चा भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

यदि भाजपा पुराने कांग्रेसी पृष्ठभूमि से भाजपा में आए किसी वरिष्ठ नेता को प्रतिनिधित्व देने का निर्णय करती है, तो राजनीतिक समीकरण अलग होगा। लेकिन फिलहाल विजय बहुगुणा को टिकट दिए जाने की भाजपा की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

इसलिए सवाल व्यक्ति से बड़ा है—

क्या भाजपा यह सीट प्रदेश संगठन को देगी या दिल्ली इसे किसी बड़े राष्ट्रीय राजनीतिक समीकरण के लिए इस्तेमाल करेगी?

नए प्रभारी राम माधव की मौजूदगी भी महत्वपूर्ण

इस बीच भाजपा ने संगठनात्मक फेरबदल करते हुए राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राम माधव को उत्तराखंड का नया प्रभारी बनाया है। उनके साथ अरविंद मेनन और बांसुरी स्वराज को सह-प्रभारी की जिम्मेदारी मिली है। 

राज्यसभा उम्मीदवार के चयन और 2027 की तैयारियों का समय लगभग एक साथ आने के कारण केंद्रीय नेतृत्व के निर्णय पर राजनीतिक निगाहें और बढ़ गई हैं।

6 अक्टूबर तक खुल जाएगा पत्ता

चुनाव आयोग ने 29 सितंबर को चुनाव की अधिसूचना जारी कर दी है। नामांकन की अंतिम तारीख 6 अक्टूबर और मतदान 16 अक्टूबर है। नरेश बंसल का कार्यकाल 25 नवंबर को समाप्त होगा। 

इसलिए भाजपा हाईकमान के पास अब फैसला लेने के लिए बहुत लंबा समय नहीं है।

स्थानीय कार्यकर्ता या दिल्ली का दिग्गज?
गढ़वाल-कुमाऊं का संतुलन या राष्ट्रीय समीकरण?
पुराना भाजपाई या हाल में साथ आया कोई बड़ा राजनीतिक चेहरा?

उत्तराखंड की एक राज्यसभा सीट पर इस बार उम्मीदवार की घोषणा सिर्फ एक नाम नहीं बताएगी—यह इस बात का भी संकेत दे सकती है कि भाजपा 2027 से पहले उत्तराखंड और दिल्ली की राजनीति के बीच किस तरह का संतुलन बनाना चाहती है।

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