मोदी–शी–पुतिन की कूटनीतिक त्रिकोण पर दुनिया की नजर: तनाव से संवाद तक, भारत-चीन-रूस रिश्तों में नया दौर

इन घटनाक्रमों ने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया है—क्या भारत, रूस और चीन के बीच वर्षों पुराना RIC (Russia-India-China) strategic triangle एक नए रूप में वापस उभर रहा है?

 

नई दिल्ली, 10 सितंबर 2026 | Voice of Nation | 10:48 PM IST

नई दिल्ली में 12–13 सितंबर को होने जा रहे 18वें BRICS Summit से पहले दुनिया की निगाहें केवल सम्मेलन के औपचारिक एजेंडे पर नहीं, बल्कि तीन बड़े नेताओं—प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन—पर टिक गई हैं।

शी जिनपिंग सात वर्षों बाद भारत आ रहे हैं और 2020 की गलवान झड़प के बाद यह उनकी पहली भारत यात्रा होगी। वहीं पुतिन की भारत यात्रा ऐसे समय हो रही है जब नई दिल्ली और मॉस्को ऊर्जा, रक्षा और औद्योगिक सहयोग को और विस्तार देने की तैयारी कर रहे हैं। 

इन घटनाक्रमों ने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया है—क्या भारत, रूस और चीन के बीच वर्षों पुराना RIC (Russia-India-China) strategic triangle एक नए रूप में वापस उभर रहा है?

गलवान से यहां तक: भारत-चीन संबंधों ने लंबा रास्ता तय किया

भारत और चीन के संबंधों में सबसे बड़ा मोड़ जून 2020 की गलवान घाटी की हिंसक झड़प थी। इसके बाद दोनों देशों के राजनीतिक विश्वास, सीमा संबंधों और आर्थिक रिश्तों में गंभीर गिरावट आई।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सैन्य और कूटनीतिक बातचीत के जरिए तनाव कम करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी। हाल के महीनों में दोनों देशों के बीच border management पर बातचीत, कुछ direct flights की वापसी, border trade और economic engagement को धीरे-धीरे सामान्य करने की कोशिशें हुई हैं। 

अब शी जिनपिंग का दिल्ली आना इस प्रक्रिया का अब तक का सबसे बड़ा diplomatic signal है।

चीन ने आधिकारिक तौर पर पुष्टि की है कि शी 12–13 सितंबर के BRICS Summit में भाग लेने भारत आएंगे। यह 2019 के बाद उनकी पहली भारत यात्रा होगी। 

व्यापार ने राजनीतिक तनाव के बावजूद रिश्ता टूटने नहीं दिया

भारत-चीन संबंधों की सबसे दिलचस्प बात यह रही कि सीमा पर तनाव के बावजूद व्यापारिक निर्भरता समाप्त नहीं हुई।

Financial Times के अनुसार bilateral trade पिछले वर्ष रिकॉर्ड $155 billion तक पहुंचा और इस वर्ष के शुरुआती सात महीनों में इसमें 23 प्रतिशत की और वृद्धि दर्ज हुई। भारत ने electronics और solar जैसे क्षेत्रों में Chinese participation से जुड़े कुछ प्रतिबंधों को भी धीरे-धीरे आसान किया है। 

लेकिन इसका अर्थ पूर्ण normalization नहीं है।

Reuters के अनुसार Chinese investment, visas, technology transfer और sensitive sectors में अभी भी दोनों देशों के बीच गंभीर trust deficit मौजूद है। BYD और Great Wall Motor जैसी कंपनियों से जुड़े investment issues तथा Xiaomi जैसी कंपनियों पर भारतीय scrutiny पुराने तनाव की याद दिलाते हैं। 

इसलिए वर्तमान दौर को friendship से अधिक “cautious reset” कहना ज्यादा सही होगा।

रूस: भारत का दशकों पुराना रणनीतिक साथी

चीन के विपरीत रूस के साथ भारत के संबंधों की बुनियाद दशकों पुराने defence, diplomatic और strategic cooperation पर टिकी हुई है।

Ukraine युद्ध और पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद नई दिल्ली ने मॉस्को के साथ अपने संबंध समाप्त नहीं किए। भारत ने strategic autonomy की नीति अपनाते हुए रूस के साथ ऊर्जा और रक्षा संबंध बनाए रखे, जबकि साथ-साथ अमेरिका और यूरोप के साथ भी साझेदारी बढ़ाई।

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अब पुतिन फिर दिल्ली आ रहे हैं।

रूस के भारत में राजदूत Denis Alipov ने भारत की BRICS presidency की प्रशंसा करते हुए कहा है कि Putin की आगामी यात्रा के दौरान defence, energy और industrial cooperation महत्वपूर्ण विषय रहेंगे। 

रूसी तेल ने बदल दिया आर्थिक रिश्ता

Ukraine युद्ध के बाद discounted Russian crude ने भारत-रूस economic relationship का स्वरूप काफी बदल दिया।

रूस भारत के प्रमुख crude suppliers में शामिल हो गया और ऊर्जा व्यापार ने दोनों देशों के bilateral commerce को अभूतपूर्व स्तर तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई।

अब दोनों सरकारों के सामने चुनौती है कि संबंध केवल oil और defence तक सीमित न रहें।

इसलिए manufacturing, joint ventures, rare earths, industrial technology और investment जैसे क्षेत्रों को अगले चरण में ले जाने की कोशिश हो रही है। 

Defence cooperation में भी नए विकल्पों की चर्चा है। Russian side ने Su-57 fighter aircraft और technology-transfer जैसे संभावित सहयोग की बात की है, हालांकि किसी संभावित defence deal को final agreement होने से पहले निश्चित नहीं माना जाना चाहिए। 

मोदी–पुतिन: दोस्ती के साथ Ukraine पर स्पष्ट संदेश

भारत-रूस संबंधों की एक खास बात यह है कि strategic partnership कायम रहने के बावजूद भारत ने Ukraine युद्ध पर रूस की हर नीति का समर्थन नहीं किया।

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हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने पुतिन से बातचीत में लंबे समय से जारी युद्ध समाप्त करने की आवश्यकता पर फिर जोर दिया। 

यह भारत की foreign policy का महत्वपूर्ण संकेत है।

नई दिल्ली मॉस्को से अपने पुराने संबंध बनाए रखना चाहती है, लेकिन साथ ही वह Ukraine conflict में negotiation और diplomacy की सार्वजनिक वकालत करती रही है।

यानी भारत की Russia policy friendship without automatic alignment की है।

और चीन-रूस? दोनों की साझेदारी भारत के लिए अवसर भी, चुनौती भी

पिछले कुछ वर्षों में Russia-China relations काफी मजबूत हुए हैं। Western sanctions और Ukraine युद्ध के बाद Moscow की Beijing पर economic dependence भी बढ़ी है।

यहीं भारत के सामने strategic challenge पैदा होता है।

भारत रूस को अपना पुराना strategic partner मानता है, जबकि चीन के साथ उसका unresolved boundary dispute और Indo-Pacific में strategic competition मौजूद है।

इसलिए भारत के लिए आदर्श स्थिति यह होगी कि Moscow-Beijing relationship इतना एकतरफा न हो जाए कि Russia की Asia policy पूरी तरह China-centric हो जाए।

यही कारण है कि Russia-India-China (RIC) dialogue भारत के लिए अभी भी strategic value रख सकता है।

भारत के विदेश मंत्रालय के रिकॉर्ड के अनुसार मार्च 2026 में मोदी, पुतिन और शी के बीच Russia-India-China trilateral interaction भी हुआ था। 

SCO ने दिखाई बदलती तस्वीर

पिछले सप्ताह Kyrgyzstan में हुए Shanghai Cooperation Organisation summit ने इस बदलती diplomacy की झलक दिखाई।

मोदी, शी और पुतिन सहित कई Eurasian leaders एक ही मंच पर मौजूद रहे। पुतिन ने मोदी और शी दोनों के साथ बातचीत की। AP के अनुसार SCO तेजी से ऐसे मंच के रूप में उभरा है जहां China, Russia, India और अन्य Eurasian powers पश्चिमी नेतृत्व वाली international architecture के समानांतर अपने हितों पर चर्चा कर रहे हैं। 

हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि तीनों देशों के हित समान हो गए हैं।

भारत-चीन सीमा विवाद, China-Pakistan relationship, Russia-Ukraine war और Indo-Pacific जैसे मुद्दों पर तीनों की प्राथमिकताएं अलग हैं।

अब दिल्ली में अगला बड़ा diplomatic moment

इसी background में BRICS 2026 बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।

Putin के 11 सितंबर और Xi Jinping के 12 सितंबर को भारत पहुंचने की संभावना है। दिल्ली में दोनों नेताओं के लिए बड़े स्तर की सुरक्षा व्यवस्था की जा रही है। 

लेकिन सबसे ज्यादा निगाह Modi-Xi bilateral meeting पर होगी।

इस बातचीत में border stability से आगे trade, investment, visas, technology और economic cooperation की दिशा में प्रगति होती है या नहीं—यह आने वाले भारत-चीन संबंधों का महत्वपूर्ण संकेत होगा। 

इसी तरह Modi-Putin talks में energy और defence के अलावा rare earths, manufacturing और bilateral investment जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हो सकते हैं। 

क्या लौट रहा है RIC?

इसे अभी India-China-Russia alliance कहना गलत होगा।

भारत किसी China-Russia bloc का हिस्सा बनने के बजाय अपनी strategic autonomy बनाए रखना चाहता है। अमेरिका, Europe, Japan और Quad देशों के साथ भारत के मजबूत संबंध इसके समानांतर चलते रहेंगे।

लेकिन 2020 के बाद पहली बार परिस्थितियां ऐसी बन रही हैं जिसमें India-China diplomatic thaw + मजबूत India-Russia partnership + गहरी Russia-China partnership एक ही समय पर दिखाई दे रही हैं।

इससे RIC के लिए नई diplomatic space बन सकती है।

और इसका महत्व केवल तीन देशों तक सीमित नहीं है।

भारत, चीन और रूस तीनों परमाणु शक्तियां हैं; तीनों BRICS और SCO में महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं और energy, manufacturing, defence, technology तथा global governance में उनका व्यापक प्रभाव है।

इसीलिए दिल्ली में मोदी, शी और पुतिन की diplomacy को Washington, Brussels से लेकर Tokyo तक करीब से देखा जाएगा।

BRICS 2026 शायद किसी नए गठबंधन की शुरुआत न हो, लेकिन यह उस बदलती विश्व व्यवस्था की तस्वीर जरूर पेश कर सकता है जिसमें भारत किसी एक camp में जाने के बजाय अलग-अलग शक्तियों के साथ अपने हितों के आधार पर संबंध बनाने की कोशिश कर रहा है।

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