दिल्ली से दुनिया को नया संदेश: Modi-Xi-Putin की जुगलबंदी, क्या BRICS बदलेगा World Order?
आज की बदलती दुनिया में यह रिश्ता और महत्वपूर्ण हो गया है।
Voice of Nation | 13 September 2026 | 10:15 PM IST
नई दिल्ली। दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था में शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है। इसी बदलाव के बीच नई दिल्ली में आयोजित 18वां BRICS Summit बेहद महत्वपूर्ण बन गया है।
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मौजूदगी ने दुनिया का ध्यान खींचा। वहीं, विस्तारित BRICS के दूसरे देशों की भागीदारी ने मंच को और बड़ा बनाया।
अब BRICS केवल पांच उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह नहीं रहा। इसका दायरा लगातार बढ़ा है। साथ ही, Global South की आवाज भी इस मंच पर अधिक मुखर हुई है।
इस बार संदेश भी साफ दिखाई दिया। सदस्य देश वैश्विक संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व चाहते हैं। इसके अलावा व्यापार, वित्त, AI और स्थानीय मुद्राओं में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया गया।
ऐसे में सवाल उठता है—क्या नई दिल्ली से उस नए World Order की नींव मजबूत हो रही है, जिसमें पश्चिम अकेला शक्ति केंद्र नहीं रहेगा?
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भारत के लिए कूटनीतिक रूप से अहम रहा BRICS Summit
भारत की अध्यक्षता में 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में 18वां BRICS Summit आयोजित हुआ। इसकी थीम resilience, innovation, cooperation और sustainability पर केंद्रित रही।
प्रधानमंत्री मोदी ने वैश्विक तनावों पर चिंता जताई। उन्होंने supply-chain disruptions और technology के weaponisation जैसे खतरों का भी उल्लेख किया।
इसके अलावा भारत ने Global South को वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अधिक भूमिका देने की वकालत की। BRICS ने संयुक्त राष्ट्र सहित प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार की जरूरत भी दोहराई।
यही भारत की कूटनीतिक रणनीति को खास बनाता है। नई दिल्ली पश्चिमी देशों के साथ मजबूत संबंध बनाए हुए है। दूसरी ओर रूस के साथ उसकी पुरानी strategic partnership भी कायम है।
इसी बीच चीन के साथ संबंध सुधारने की कोशिश भी आगे बढ़ी है।
इसलिए BRICS भारत के लिए किसी एक खेमे को चुनने का मंच नहीं है। बल्कि यह strategic autonomy को आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण माध्यम बनता दिखाई देता है।
Modi-Xi मुलाकात ने खींचा सबसे ज्यादा ध्यान
Summit के सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रमों में नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात रही।
दोनों नेताओं ने व्यापार, लोगों की आवाजाही और द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने पर चर्चा की। इसके साथ सीमा क्षेत्रों में शांति बनाए रखने की जरूरत पर भी जोर दिया गया। शी की यह सात वर्षों में पहली भारत यात्रा थी।
यह मुलाकात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 2020 के सीमा तनाव के बाद दोनों देशों के संबंध गंभीर दबाव में आ गए थे।
हालांकि, पिछले कुछ समय से संबंधों में धीरे-धीरे सुधार के संकेत दिखाई दे रहे हैं।
अब व्यापार और transport links बढ़ाने की बात भी सामने आई है। इसके अलावा दोनों देशों ने आर्थिक चिंताओं पर बातचीत जारी रखने का संकेत दिया।
भारत और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा खत्म नहीं हुई है। सीमा विवाद भी पूरी तरह हल नहीं हुआ है। फिर भी संवाद की वापसी अपने आप में महत्वपूर्ण बदलाव है।
भारत-चीन के बीच व्यापार असंतुलन भी बड़ी चुनौती
राजनीतिक संबंध सुधरने के बावजूद आर्थिक स्तर पर भारत के सामने बड़ी चुनौती मौजूद है।
चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा काफी बड़ा है। कई भारतीय उद्योग electronics, automobile components, pharmaceutical inputs और critical minerals के लिए चीनी supply chains पर निर्भर हैं।
इसलिए नई दिल्ली केवल व्यापार बढ़ाने की बात नहीं कर सकती। उसे market access और trade imbalance का समाधान भी चाहिए।
BRICS Summit के दौरान मोदी और शी के बीच इन आर्थिक मुद्दों पर भी चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने व्यापार संबंधों को अधिक संतुलित बनाने की जरूरत स्वीकार की।
यदि आने वाले वर्षों में इसका ठोस परिणाम निकलता है, तो BRICS diplomacy का असर भारत के घरेलू उद्योग पर भी दिखाई दे सकता है।
Putin और Modi की दोस्ती का भी बड़ा संदेश
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा ने summit को एक और महत्वपूर्ण आयाम दिया।
भारत और रूस ने व्यापार तथा रणनीतिक संबंधों को और मजबूत करने की इच्छा जताई है। दोनों देशों के बीच रक्षा, ऊर्जा और व्यापार लंबे समय से संबंधों के महत्वपूर्ण स्तंभ रहे हैं।
आज की बदलती दुनिया में यह रिश्ता और महत्वपूर्ण हो गया है।
भारत अमेरिका और यूरोप के साथ भी तेजी से संबंध बढ़ा रहा है। इसके बावजूद रूस के साथ अपने पुराने संबंधों को छोड़ने का संकेत उसने नहीं दिया है।
यही भारत की multi-alignment diplomacy की खासियत है।
भारत अलग-अलग वैश्विक शक्तियों के साथ अपने हितों के आधार पर संबंध बनाने की कोशिश कर रहा है।
Xi का नया दांव—‘Greater BRICS’
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने summit में “Greater BRICS” cooperation को आगे बढ़ाने की बात कही।
उनका जोर केवल राजनीतिक सहयोग पर नहीं था। चीन BRICS के भीतर AI, trade, finance और industrial cooperation को भी तेजी से आगे बढ़ाना चाहता है।
शी ने AI cooperation को महत्वपूर्ण क्षेत्र बताया। चीन ने BRICS AI Open Source Zone जैसे प्रस्तावों को भी आगे रखा है। इसके अलावा service trade और Special Economic Zone cooperation पर नए कदम प्रस्तावित किए गए।
यह पहल भविष्य में काफी महत्वपूर्ण हो सकती है।
AI अब केवल technology का विषय नहीं रहा। यह आर्थिक और geopolitical power का भी बड़ा साधन बन रहा है।
इसलिए BRICS के भीतर AI ecosystem बनाने की कोशिश अमेरिका और पश्चिम के technology dominance के संदर्भ में भी देखी जाएगी।
डॉलर का विकल्प या केवल स्थानीय मुद्राओं में ज्यादा व्यापार?
BRICS को लेकर सबसे अधिक चर्चा अक्सर डॉलर के विकल्प की होती है। हालांकि, New Delhi Declaration ने किसी नई साझा BRICS currency की घोषणा नहीं की।
इसके बजाय सदस्य देशों ने स्थानीय मुद्राओं में transactions बढ़ाने और cross-border payment systems को मजबूत करने पर जोर दिया है।
यह अंतर महत्वपूर्ण है।
अभी डॉलर को अचानक हटाकर कोई BRICS currency लाने जैसी स्थिति नहीं है। फिर भी bilateral और multilateral trade में local currencies का उपयोग बढ़ना एक धीरे-धीरे होने वाला बदलाव हो सकता है।
यदि यह व्यवस्था बड़े स्तर पर सफल होती है, तो international trade में डॉलर पर कुछ निर्भरता कम हो सकती है।
लेकिन इसके लिए BRICS देशों के बीच मजबूत financial infrastructure जरूरी होगा।
BRICS की ताकत—दुनिया की लगभग आधी आबादी
विस्तार के बाद BRICS का वैश्विक महत्व काफी बढ़ गया है।
भारत, चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के अलावा इसमें नए सदस्य जुड़े हैं। इनमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया जैसे देश शामिल हैं।
आज विस्तारित BRICS दुनिया की लगभग आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है। प्रधानमंत्री मोदी ने summit में इसके करीब 40 प्रतिशत global GDP का प्रतिनिधित्व करने की बात भी कही।
यही आंकड़े BRICS को महत्वपूर्ण बनाते हैं।
इसके सदस्य देशों में बड़े energy producers भी हैं। वहीं दुनिया के सबसे बड़े consumer markets भी इसी समूह में मौजूद हैं।
इसलिए यदि सदस्य देशों के बीच आर्थिक integration बढ़ता है, तो इसका असर global trade पर पड़ना स्वाभाविक है।
Global South को मिल सकती है बड़ी आवाज
BRICS की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत Global South बन सकता है।
एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई देशों की लंबे समय से शिकायत रही है कि वैश्विक संस्थाओं में उनका प्रतिनिधित्व उनकी आबादी और आर्थिक महत्व के अनुरूप नहीं है।
इसीलिए BRICS संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में सुधार की मांग लगातार उठा रहा है।
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नई दिल्ली Declaration में भी अधिक न्यायसंगत और प्रतिनिधित्वपूर्ण global governance की बात की गई है।
भारत इस मुद्दे को लंबे समय से उठाता रहा है।
यदि BRICS इस मांग को संगठित राजनीतिक ताकत में बदलता है, तो आने वाले वर्षों में UN, IMF और World Bank जैसे संस्थानों में reform की बहस और तेज हो सकती है।
Middle East संकट में भी BRICS ने दिखाई सहमति
इस summit की एक और महत्वपूर्ण बात सदस्य देशों के बीच consensus रहा।
Middle East में जारी गंभीर तनाव के बावजूद BRICS देशों ने de-escalation और diplomacy की जरूरत पर सहमति जताई। ईरान और UAE जैसे अलग-अलग रणनीतिक हित रखने वाले देशों का साझा declaration पर सहमत होना भी उल्लेखनीय रहा।
इससे BRICS की diplomatic relevance बढ़ सकती है।
हालांकि, समूह के भीतर मतभेद भी कम नहीं हैं। सदस्य देशों की विदेश नीति और सुरक्षा प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं।
इसलिए किसी एक मुद्दे पर सहमति बनना और एक साझा geopolitical bloc बन जाना दो अलग बातें हैं।
क्या BRICS अमेरिका और पश्चिम के खिलाफ नया गठबंधन है?
इस सवाल का उत्तर इतना सरल नहीं है।
रूस और चीन BRICS को पश्चिमी वर्चस्व के विकल्प के रूप में अधिक आक्रामक तरीके से देखते हैं। वहीं भारत की रणनीति अलग है।
भारत BRICS का प्रमुख सदस्य है। लेकिन उसके अमेरिका, यूरोप, जापान और अन्य पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं के साथ भी महत्वपूर्ण संबंध हैं।
इसलिए भारत के लिए BRICS का अर्थ “West versus Rest” की लड़ाई नहीं होना चाहिए।
नई दिल्ली के लिए ज्यादा उपयोगी मॉडल multipolarity का है। इसमें अमेरिका महत्वपूर्ण शक्ति बना रहे, लेकिन दुनिया की व्यवस्था केवल एक शक्ति केंद्र पर निर्भर न हो।
यही अंतर भारत की BRICS strategy को चीन और रूस से अलग बनाता है।
Modi-Xi-Putin की तस्वीर का वास्तविक अर्थ क्या है?
नई दिल्ली में मोदी, शी और पुतिन का एक मंच पर होना निश्चित रूप से शक्तिशाली diplomatic optics है।
लेकिन केवल तस्वीर से नया world order नहीं बनता।
असल परीक्षा trade, investment, technology, financial systems और geopolitical cooperation में होगी।
यदि BRICS इन क्षेत्रों में वास्तविक संस्थागत व्यवस्था तैयार करता है, तो उसकी ताकत तेजी से बढ़ सकती है।
वहीं, यदि संगठन केवल declarations और annual summits तक सीमित रहा, तो इसकी राजनीतिक क्षमता सीमित रह सकती है।
इसलिए आने वाले कुछ वर्ष निर्णायक होंगे।
भारत बन सकता है East और West के बीच महत्वपूर्ण शक्ति
भारत के लिए इस पूरे घटनाक्रम में एक बड़ा अवसर दिखाई देता है।
नई दिल्ली Washington से बात कर सकती है। वहीं Moscow के साथ strategic partnership बनाए रख सकती है। Beijing के साथ प्रतिस्पर्धा के बावजूद संवाद कर सकती है।
इसके अलावा भारत Global South के देशों के साथ भी अपनी भूमिका बढ़ा रहा है।
यह स्थिति भारत को किसी एक camp का सदस्य बनने के बजाय अलग global pole बनने का अवसर देती है।
हालांकि, इसके लिए आर्थिक शक्ति बढ़ाना सबसे जरूरी होगा। मजबूत manufacturing, technology और exports के बिना diplomatic influence की भी सीमा होती है।
इसलिए BRICS की सफलता भारत के घरेलू economic transformation से भी जुड़ी है।
दिल्ली Summit के बाद अब नजर चीन पर
भारत की BRICS chairship के बाद अगली अध्यक्षता चीन संभालेगा। चीन 2027 में 19वें BRICS Summit की मेजबानी करेगा।
इसलिए अगला साल महत्वपूर्ण रहेगा।
यह देखना होगा कि चीन “Greater BRICS” को किस दिशा में ले जाता है। साथ ही यह भी महत्वपूर्ण होगा कि भारत उस एजेंडे को किस हद तक समर्थन देता है।
BRICS का विस्तार उसकी ताकत भी है और चुनौती भी।
जितने अधिक सदस्य होंगे, उतने ही अलग-अलग राष्ट्रीय हित सामने आएंगे। इसलिए consensus बनाना कठिन हो सकता है।
फिर भी New Delhi Summit ने दिखाया है कि अलग-अलग हित रखने वाले देश कई बड़े वैश्विक मुद्दों पर साझा मंच बना सकते हैं।
क्या दिल्ली से शुरू हो रहा है नया World Order?
अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि BRICS पश्चिमी नेतृत्व वाली वैश्विक व्यवस्था को बदल चुका है।
अमेरिकी अर्थव्यवस्था, डॉलर और पश्चिमी financial institutions की ताकत आज भी बहुत बड़ी है।
इसके बावजूद एक बदलाव स्पष्ट दिखाई देता है।
चीन आर्थिक शक्ति है। भारत तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है। रूस geopolitical और energy power बना हुआ है। वहीं BRICS का विस्तार Global South के कई महत्वपूर्ण देशों को एक मंच पर ला रहा है।
इसलिए सवाल अब यह नहीं है कि BRICS महत्वपूर्ण है या नहीं।
असली सवाल यह है कि BRICS अपनी बढ़ती आर्थिक और जनसांख्यिकीय ताकत को वास्तविक वैश्विक प्रभाव में कितनी तेजी से बदल पाता है।
नई दिल्ली में Modi, Xi और Putin की मौजूदगी ने इसी बदलती दुनिया की झलक दिखाई है।
और भारत के लिए सबसे बड़ा अवसर शायद यही है—किसी एक महाशक्ति के पीछे चलने के बजाय उभरती multipolar दुनिया के प्रमुख शक्ति केंद्रों में अपनी स्वतंत्र जगह बनाना।
मोदी ने BRICS के सामने रखा चार स्तंभों वाला रोडमैप
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में भारत की अध्यक्षता का विस्तृत रोडमैप भी सामने रखा। उन्होंने Resilience, Innovation, Cooperation और Sustainability को भारत की BRICS Presidency के चार प्रमुख स्तंभ बताया।
प्रधानमंत्री ने कहा कि दुनिया में तनाव लगातार बढ़ रहे हैं। इसका असर सामान्य लोगों के जीवन पर भी पड़ रहा है। वहीं, महामारी, climate disasters और supply-chain disruptions ने दुनिया के सामने नई चुनौतियां खड़ी की हैं।
मोदी के मुताबिक आज की interconnected world में कोई संकट केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। इसलिए BRICS देशों को संकट आने के बाद प्रतिक्रिया देने के बजाय पहले से तैयार रहना होगा।
इसी दिशा में BRICS ने कई महत्वपूर्ण पहल आगे बढ़ाई हैं।
बीमारियों से निपटने के लिए BRICS Early Warning System
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में BRICS Integrated Early Warning System का विशेष उल्लेख किया। इसका उद्देश्य infectious diseases की रोकथाम और समय रहते response को बेहतर बनाना है।
इसके अलावा disaster management के लिए Early Warning Data Integration Guidelines तैयार की गई हैं।
Supply chains को मजबूत करना भी भारत के BRICS agenda का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके लिए BRICS Logistics Supply Chain Cooperation Framework तैयार किया गया है।
इसका उद्देश्य सदस्य देशों की supply chains को अधिक reliable और resilient बनाना है।
यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कोविड महामारी के बाद दुनिया ने supply-chain disruption का गंभीर असर देखा था। इसके बाद geopolitical conflicts ने भी global trade को प्रभावित किया।
Startups के लिए BRICS Incubator Network और Innovation Fund
भारत ने BRICS को innovation और startups से जोड़ने की दिशा में भी महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखे हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि BRICS Incubator Network सदस्य देशों के startups और incubators को आपस में जोड़ेगा।
इसके अलावा भारत ने BRICS Startup Innovation Fund का प्रस्ताव रखा है। इसका उद्देश्य innovative और scalable solutions को बढ़ावा देना है।
यदि यह व्यवस्था प्रभावी तरीके से आगे बढ़ती है, तो BRICS देशों के startups को एक बड़ा साझा ecosystem मिल सकता है।
इससे technology, investment और innovation के क्षेत्र में सदस्य देशों के बीच सहयोग बढ़ने की संभावना है।
किसानों तक पहुंचेगा AI और Digital Public Infrastructure
BRICS Summit में agriculture और technology के मेल पर भी भारत ने महत्वपूर्ण पहल रखी।
BRICS Network on Digital Agriculture के जरिए AI, geospatial technology और Digital Public Infrastructure को किसानों की जरूरतों से जोड़ने की योजना है।
यह प्रस्ताव भारत के लिए खास महत्व रखता है। देश में agriculture बड़ी आबादी की आजीविका से जुड़ा है।
वहीं, AI और satellite-based technologies खेती के तरीके तेजी से बदल सकती हैं।
फसल की निगरानी, मौसम की जानकारी और संसाधनों के बेहतर उपयोग में नई technology किसानों की मदद कर सकती है।
इसलिए BRICS Digital Agriculture Network भविष्य में सदस्य देशों के बीच agricultural technology sharing का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।
Critical Minerals और Technology का ‘Weaponization’ बड़ा मुद्दा
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में एक बेहद महत्वपूर्ण geopolitical मुद्दा भी उठाया।
उन्होंने कहा कि Technology और Critical Minerals का weaponization साझा प्रगति में बाधा बन सकता है।
यह बयान मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में खास महत्व रखता है।
Semiconductors, batteries, defence technology और clean-energy systems के लिए critical minerals जरूरी हैं। इसलिए lithium, cobalt, rare-earth elements और दूसरे strategic minerals की supply वैश्विक राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।
इसी तरह advanced technology और semiconductor supply पर नियंत्रण भी देशों की रणनीतिक ताकत से जुड़ गया है।
भारत का संदेश है कि technology adoption inclusive होना चाहिए। यानी technological development को geopolitical दबाव का हथियार बनाने से बचना होगा।
BRICS केवल सरकारों का मंच नहीं: मोदी
प्रधानमंत्री ने BRICS cooperation को केवल सरकारों और diplomats तक सीमित नहीं रखने की बात भी कही।
उन्होंने entrepreneurs, farmers, researchers, women और youth को BRICS की प्रक्रिया से जोड़ने पर जोर दिया।
इसी उद्देश्य से भारत ने BRICS CONNECT को आगे बढ़ाया है। इसके तहत skills, employability, women in workforce, social security और capacity building पर सहयोग बढ़ाने की योजना है।
इससे BRICS को केवल summit diplomacy से निकालकर लोगों से जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है।
यदि इन initiatives का वास्तविक implementation होता है, तो BRICS का प्रभाव आम नागरिकों और businesses तक पहुंच सकता है।
MSME के लिए BRICS Cooperation Portal
भारत ने छोटे और मध्यम उद्योगों को भी BRICS agenda में महत्वपूर्ण स्थान दिया है।
प्रधानमंत्री मोदी ने BRICS MSME Cooperation Portal की पहल का उल्लेख किया। इसका उद्देश्य छोटे उद्यमों को knowledge, finance और नए markets से जोड़ना है।
भारत जैसे देश के लिए यह महत्वपूर्ण पहल हो सकती है।
MSME sector रोजगार और manufacturing दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। वहीं, BRICS के विस्तारित बाजार भारतीय छोटे उद्योगों के लिए नए अवसर पैदा कर सकते हैं।
इसके अलावा शहरों के बीच best practices साझा करने के लिए BRICS Urban Mobility Hub की स्थापना की गई है।
इससे transport और urban infrastructure से जुड़े अनुभव सदस्य देशों के बीच साझा किए जा सकेंगे।
Clean Energy के लिए Digital Centre of Excellence
Sustainability भी भारत की BRICS Presidency के चार प्रमुख स्तंभों में शामिल है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि भारतीय सभ्यता विकास और पर्यावरण को एक-दूसरे का विरोधी नहीं मानती। दोनों के बीच संतुलन जरूरी है।
इसी दिशा में Smart Grids और Energy Storage के लिए BRICS Digital Centre of Excellence बनाया गया है।
इसका उद्देश्य clean-energy systems को अधिक reliable, efficient और accessible बनाना है।
इसके अलावा Agro-Ecology और Regenerative Agriculture के लिए Centers of Excellence विकसित किए जा रहे हैं।
इनके माध्यम से traditional knowledge को modern science के साथ जोड़ने का प्रयास होगा।
‘Solutions Global South के साथ मिलकर बनें’
प्रधानमंत्री के भाषण का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश Global South को लेकर रहा।
मोदी ने कहा कि BRICS में विकसित solutions का फायदा केवल सदस्य देशों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इन्हें Global South की जरूरतों के अनुरूप adaptable और accessible बनाना होगा।
उन्होंने BRICS में Global South के बढ़ते विश्वास की भी बात कही।
प्रधानमंत्री के अनुसार यहां उनकी आवाज सुनी जाती है और उनके अनुभव का सम्मान किया जाता है। साथ ही solutions उनके लिए नहीं, बल्कि उनके साथ मिलकर तैयार किए जाते हैं।
यही विचार BRICS को पश्चिमी नेतृत्व वाली संस्थाओं से अलग पहचान देने की कोशिश भी करता है।
Modi-Xi-Putin से आगे भी है इस BRICS Summit की कहानी
नई दिल्ली Summit की सबसे आकर्षक तस्वीर निश्चित रूप से Modi, Xi और Putin की एक मंच पर मौजूदगी है। लेकिन summit की वास्तविक अहमियत इससे कहीं आगे जाती है।
भारत ने health early-warning system से लेकर startups तक कई initiatives सामने रखे हैं। Agriculture में AI और Digital Public Infrastructure को जोड़ने की तैयारी भी है।
इसके अलावा MSMEs, critical minerals, supply chains और clean energy को BRICS cooperation का हिस्सा बनाया गया है।
इसलिए 2026 का New Delhi Summit केवल geopolitical signalling तक सीमित नहीं है।
यदि ये योजनाएं जमीन पर लागू होती हैं, तो BRICS एक diplomatic grouping से आगे बढ़कर technology, trade, agriculture, health और development cooperation का बड़ा international platform बन सकता है।
और शायद यही भारत की BRICS Presidency का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है—Global South को केवल दुनिया की बड़ी शक्तियों के फैसलों का उपभोक्ता नहीं, बल्कि भविष्य की वैश्विक व्यवस्था का भागीदार बनाया जाए।