हरीश रावत के इस्तीफे से थमेगी कांग्रेस की गुटबाजी? गणेश गोदियाल को मिल सकती है मजबूती
वहीं, कुमारी सैलजा को यह सुनिश्चित करना होगा कि संगठन फिर नए गुटों में न बंटे।
Voice of Nation | 12.09.2026 | Dehradun | 11:15 AM IST

देहरादून। ( मनीष वर्मा, नई दिल्ली/ देहरादून) उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति एक बार फिर बड़े बदलाव के दौर में दिखाई दे रही है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के इस्तीफे की पेशकश ने पार्टी के भीतर नई बहस शुरू कर दी है। इसका असर आने वाले दिनों में प्रदेश संगठन पर भी दिखाई दे सकता है।
हरीश रावत लंबे समय से उत्तराखंड कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली नेताओं में रहे हैं। हालांकि, उनके दौर में पार्टी के भीतर कई शक्ति केंद्र भी बने। समय-समय पर इन गुटों के बीच मतभेद सार्वजनिक होते रहे हैं।
अब परिस्थितियां बदलती दिखाई दे रही हैं। प्रदेश कांग्रेस की कमान गणेश गोदियाल के हाथ में है। वहीं, प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा भी संगठन को सक्रिय करने में जुटी हैं।
ऐसे में बड़ा सवाल है कि क्या कांग्रेस पुराने गुटीय समीकरणों से बाहर निकल पाएगी? साथ ही, क्या पार्टी 2027 से पहले एक नई और मजबूत टीम तैयार कर सकेगी?
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हरीश रावत के फैसले से बदल सकते हैं समीकरण
हरीश रावत का उत्तराखंड की राजनीति में लंबा अनुभव है। केंद्र से लेकर राज्य तक उन्होंने महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली हैं। मुख्यमंत्री के रूप में भी उन्होंने प्रदेश की कमान संभाली।
इसके बावजूद कांग्रेस के भीतर उनके कार्यकाल और नेतृत्व को लेकर विवाद भी रहे। कई वरिष्ठ नेताओं के साथ उनके राजनीतिक मतभेद समय-समय पर सामने आए। इसका असर संगठन की एकजुटता पर भी पड़ा।
वहीं, अलग-अलग नेताओं के समर्थकों के बीच खींचतान लगातार चर्चा में रही। चुनाव के दौरान भी टिकट वितरण और नेतृत्व को लेकर सवाल उठते रहे।
इसलिए हरीश रावत का मौजूदा फैसला केवल व्यक्तिगत राजनीतिक कदम नहीं माना जा रहा। इससे प्रदेश कांग्रेस के आंतरिक समीकरण भी बदल सकते हैं।
हालांकि, रावत का अपना राजनीतिक जनाधार आज भी है। पहाड़ से लेकर मैदानी क्षेत्रों तक उनके समर्थक मौजूद हैं। इसलिए कांग्रेस उनके अनुभव को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं कर सकती।
फिर भी पार्टी के सामने अब पीढ़ीगत बदलाव का अवसर जरूर दिखाई दे रहा है।
पुराने विवाद भी कांग्रेस के लिए बने चुनौती
हरीश रावत के मुख्यमंत्री कार्यकाल से जुड़े कुछ विवाद वर्षों से राजनीतिक बहस का हिस्सा रहे हैं। विपक्ष ने भी इन मुद्दों को कई चुनावों में उठाया।
हाल में उनके पूर्व सहयोगी चंदन सिंह जीना के परिसरों पर प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई हुई। इसके बाद प्रदेश की राजनीति फिर गरमा गई।
हालांकि, किसी जांच या आरोप का अर्थ अपने आप दोषसिद्धि नहीं होता। अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही सामने आता है।
इसके बावजूद ऐसे मामले राजनीतिक दलों के लिए चुनावी चुनौती बनते हैं। विपक्ष इन्हें जनता के बीच मुद्दा बनाता है। इसलिए कांग्रेस को अपनी राजनीतिक रणनीति बेहद सावधानी से तैयार करनी होगी।
हरीश रावत सरकार के दौर के विवाद आज भी राजनीतिक मुद्दा
हरीश रावत के मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान भ्रष्टाचार के आरोपों ने कांग्रेस को राजनीतिक नुकसान पहुंचाया था। सबसे चर्चित मामला 2016 के राजनीतिक संकट के दौरान सामने आए कथित स्टिंग से जुड़ा था। इसमें विधायकों के समर्थन को लेकर कथित बातचीत के आरोप लगे थे। मामला बाद में जांच एजेंसियों और अदालत तक भी पहुंचा। हालांकि, हरीश रावत लगातार अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज करते रहे हैं। उन्होंने कई मौकों पर इसे राजनीतिक साजिश बताया। इसके बावजूद भाजपा ने इस प्रकरण को लंबे समय तक कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। इसलिए यह विवाद आज भी रावत सरकार के कार्यकाल से जुड़ी राजनीतिक बहस में सामने आता है।
इसके अलावा उनके शासनकाल से जुड़े अधिकारियों और करीबियों पर समय-समय पर उठे सवालों ने भी कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ाईं। अब पूर्व सहयोगी चंदन सिंह जीना के परिसरों पर ED की कार्रवाई के बाद पुरानी सरकार का दौर फिर चर्चा में है। हालांकि, फिर भी विपक्ष ऐसे मामलों को राजनीतिक जवाबदेही से जोड़कर देखता है। यही कारण है कि कांग्रेस के लिए पुराने आरोपों से दूरी बनाते हुए स्पष्ट जवाब देना जरूरी हो गया है। यदि पार्टी 2027 में भ्रष्टाचार को बड़ा मुद्दा बनाती है, तो उसे अपने शासनकाल से जुड़े विवादों पर भी पारदर्शी रुख अपनाना होगा।
स्टिंग प्रकरण ने कांग्रेस की छवि पर छोड़ा था असर
2016 का राजनीतिक संकट उत्तराखंड कांग्रेस के इतिहास की सबसे विवादित घटनाओं में शामिल रहा। उस दौरान हरीश रावत सरकार को विधानसभा में बहुमत साबित करने की चुनौती का सामना करना पड़ा था। इसी राजनीतिक उथल-पुथल के बीच एक कथित स्टिंग सामने आया। इसके बाद मामला केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहा और जांच की प्रक्रिया भी आगे बढ़ी। कांग्रेस और हरीश रावत ने आरोपों के पीछे राजनीतिक उद्देश्य होने की बात कही। वहीं, भाजपा ने इसे भ्रष्टाचार और सत्ता बचाने की कोशिश से जोड़कर लगातार मुद्दा बनाया।
इस पूरे प्रकरण का राजनीतिक प्रभाव लंबे समय तक दिखाई दिया। 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बड़ी हार का सामना करना पड़ा और भाजपा ने भारी बहुमत हासिल किया। हालांकि, किसी चुनावी हार को केवल एक विवाद का परिणाम नहीं माना जा सकता। सत्ता विरोधी लहर, संगठनात्मक मतभेद और राजनीतिक परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण कारण थीं। फिर भी कथित स्टिंग और सरकार से जुड़े विवादों ने विपक्ष को कांग्रेस के खिलाफ मजबूत राजनीतिक मुद्दे दिए। अब पार्टी के सामने चुनौती है कि वह पुराने विवादों से आगे बढ़कर नई और साफ राजनीतिक छवि तैयार करे। इसी कारण गणेश गोदियाल और कुमारी सैलजा के नेतृत्व में संगठनात्मक बदलाव की अहमियत और बढ़ जाती है।
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इसके अलावा पार्टी को यह भी तय करना होगा कि वह पुराने विवादों का जवाब कैसे देगी। केवल आरोपों को राजनीतिक साजिश बताना हर बार पर्याप्त नहीं होगा।
जनता के सामने स्पष्ट राजनीतिक और संगठनात्मक संदेश देना भी जरूरी होगा।
Ganesh Godiyal के लिए बड़ा राजनीतिक अवसर
मौजूदा परिस्थितियां प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल के लिए बड़ा अवसर बन सकती हैं। उनके सामने संगठन को एकजुट करने की चुनौती है। साथ ही, उन्हें अलग-अलग गुटों के बीच संतुलन भी बनाना होगा।
गोदियाल की राजनीतिक पहचान पहाड़ और जमीनी राजनीति से जुड़ी रही है। अब उन्हें इस पहचान को पूरे प्रदेश में संगठनात्मक ताकत में बदलना होगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि प्रदेश अध्यक्ष अपने फैसले कितनी स्वतंत्रता से ले पाते हैं। यदि हर निर्णय पुराने शक्ति केंद्रों के हिसाब से होगा, तो बदलाव मुश्किल होगा।
इसके विपरीत, यदि संगठन में प्रदर्शन को प्राथमिकता मिलेगी तो नए चेहरे सामने आ सकते हैं।
यही कारण है कि आने वाले महीनों में जिला और ब्लॉक स्तर की नियुक्तियां महत्वपूर्ण होंगी। टिकट वितरण से पहले संगठन में होने वाले बदलाव भी राजनीतिक संकेत देंगे।
इस दौर में गोदियाल को हाईकमान का स्पष्ट समर्थन मिला तो उनकी स्थिति और मजबूत हो सकती है।
कुमारी सैलजा की भूमिका भी होगी महत्वपूर्ण
उत्तराखंड कांग्रेस प्रभारी कुमारी सैलजा के सामने भी बड़ी जिम्मेदारी है। उन्हें प्रदेश के अलग-अलग नेताओं के बीच संतुलन बनाना होगा।
हालांकि, केवल संतुलन बनाने से कांग्रेस की समस्या हल नहीं होगी। पार्टी को एक स्पष्ट कमांड सिस्टम भी तैयार करना होगा।
प्रदेश अध्यक्ष को संगठन चलाने की पर्याप्त स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। वहीं, वरिष्ठ नेताओं के अनुभव का भी सही उपयोग किया जा सकता है।
इसके अलावा टिकट वितरण में गुटीय दबाव कम करना जरूरी होगा। उम्मीदवारों का चयन उनकी जमीनी पकड़ के आधार पर होना चाहिए।
सैलजा और गोदियाल की जोड़ी के सामने इसलिए दोहरी चुनौती है। पहली चुनौती पुराने विवादों को नियंत्रित करना है। दूसरी चुनौती नए नेतृत्व को तैयार करना है।
यदि दोनों इसमें सफल रहते हैं, तो कांग्रेस 2027 में अधिक संगठित तरीके से चुनाव मैदान में उतर सकती है।
हरक सिंह रावत पर भी स्पष्ट नीति जरूरी
कांग्रेस के सामने केवल हरीश रावत से जुड़ा सवाल नहीं है। पार्टी के कई दूसरे वरिष्ठ नेताओं की भूमिका पर भी चर्चा जरूरी होगी।
इनमें पूर्व मंत्री हरक सिंह रावत का नाम महत्वपूर्ण है। उनके खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय की जांच और संबंधित कानूनी कार्यवाही सार्वजनिक चर्चा में रही है।
फिर भी कांग्रेस के सामने राजनीतिक सवाल बना रहेगा। यदि पार्टी भ्रष्टाचार को भाजपा के खिलाफ बड़ा मुद्दा बनाती है, तो अपने नेताओं के लिए भी स्पष्ट मानक बनाने होंगे। कांग्रेस को देखना होगा कि यही वो हरक सिंह रावत है जिन्होंने पार्टी की बद्द पिटी और सरकार गिरायी और अपने सबसे निकट हरीश रावत से ग़द्दारी की वो भी स्वार्थ और लाभ के लिए तो क्या वो आगे विश्वासपात्र रहेंगे या गणेश गोदियाल को ही मौक़ा मिलते चित्त कर देंगे ?
इसलिए पार्टी को जांच का सामना कर रहे नेताओं की संगठनात्मक जिम्मेदारियों पर एक समान नीति बनानी चाहिए। इससे जनता के बीच उसका संदेश अधिक विश्वसनीय हो सकता है।
वहीं, किसी नेता को केवल राजनीतिक आरोपों के आधार पर दोषी ठहराना भी उचित नहीं होगा।
कांग्रेस में कई पुराने नेता अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभाव रखते हैं। हालांकि, अब केवल वरिष्ठता संगठनात्मक पद का आधार नहीं हो सकती।
पार्टी को प्रत्येक नेता के प्रदर्शन का आकलन करना चाहिए। जनाधार, सार्वजनिक छवि और संगठन में योगदान इसके प्रमुख आधार हो सकते हैं।
इसके अलावा चुनाव जिताने की क्षमता को भी महत्व देना होगा। जिन नेताओं के कारण संगठन में लगातार विवाद पैदा होते हैं, उनकी भूमिका पर पुनर्विचार किया जा सकता है।
वहीं, किसी भी नेता के खिलाफ भ्रष्टाचार जैसे गंभीर आरोप को बिना प्रमाण के तथ्य नहीं माना जाना चाहिए। पार्टी अपनी आंतरिक समीक्षा में सार्वजनिक रिकॉर्ड और जांच की स्थिति को आधार बना सकती है।
इससे एक स्पष्ट संदेश जाएगा। कांग्रेस यह दिखा सकेगी कि संगठन किसी व्यक्ति या गुट से बड़ा है।
युवा कांग्रेस और सेवादल को क्यों मिलनी चाहिए ताकत?
उत्तराखंड कांग्रेस के पास बड़ी संख्या में जमीनी कार्यकर्ता हैं। इनमें कई लोग वर्षों से संगठन के लिए काम कर रहे हैं।
इसके बावजूद बड़े पद अक्सर स्थापित नेताओं और उनके समर्थकों के आसपास घूमते रहे हैं। अब इस व्यवस्था को बदलने का मौका है।
युवा कांग्रेस को केवल प्रदर्शन और रैलियों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। उसके सक्रिय कार्यकर्ताओं को मुख्य संगठन में भी जगह मिलनी चाहिए।
इसी तरह कांग्रेस सेवादल को भी अधिक जिम्मेदारी दी जा सकती है। महिला कांग्रेस और NSUI से निकले नेताओं के लिए भी मुख्य संगठन में रास्ता खुलना चाहिए।
साथ ही, पार्टी के विभिन्न विभागों और मोर्चों के सक्रिय कार्यकर्ताओं को चुनावी रणनीति में शामिल करना होगा।
इससे कांग्रेस को नई पीढ़ी का नेतृत्व मिल सकता है। वहीं, पुराने नेताओं पर अत्यधिक निर्भरता भी कम होगी।
बूथ स्तर से शुरू करना होगा बदलाव
कांग्रेस यदि वास्तव में भाजपा को चुनौती देना चाहती है, तो बदलाव देहरादून के पार्टी कार्यालय तक सीमित नहीं रह सकता।
इसके लिए बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करना होगा। हर विधानसभा क्षेत्र में सक्रिय कार्यकर्ताओं की पहचान करनी होगी।
इसके बाद ब्लॉक और जिला स्तर पर प्रदर्शन आधारित जिम्मेदारियां दी जा सकती हैं। निष्क्रिय पदाधिकारियों की जगह सक्रिय कार्यकर्ताओं को मौका देना होगा।
वहीं, सोशल मीडिया पर सक्रिय युवाओं को भी संगठन से जोड़ना जरूरी है। आज राजनीतिक लड़ाई जमीन के साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी लड़ी जाती है।
इसके अलावा स्थानीय मुद्दों पर लगातार आंदोलन जरूरी होगा। बेरोजगारी, पलायन, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे विषयों पर कांग्रेस को अपनी मौजूदगी बढ़ानी होगी।
इस रणनीति से पार्टी का सीधा संपर्क मतदाताओं से बढ़ सकता है।
टिकट वितरण में खत्म करना होगा गुटीय कोटा
उत्तराखंड कांग्रेस के लिए सबसे कठिन परीक्षा टिकट वितरण के समय आएगी। यहीं यह पता चलेगा कि संगठन वास्तव में बदला है या नहीं।
यदि टिकट पुराने नेताओं के गुटीय कोटे के आधार पर बांटे गए, तो विवाद फिर शुरू हो सकते हैं।
इसके बजाय उम्मीदवार की स्थानीय स्वीकार्यता को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। पिछले चुनाव का प्रदर्शन भी देखा जाना चाहिए।
इसके साथ जनता से संपर्क और साफ सार्वजनिक छवि महत्वपूर्ण होनी चाहिए। संगठन के प्रति सक्रियता भी एक आधार हो सकती है।
इस प्रक्रिया में सर्वे और स्थानीय कार्यकर्ताओं की राय ली जा सकती है। इससे उम्मीदवार चयन अधिक पारदर्शी होगा।
नतीजतन बगावत की संभावना भी कम हो सकती है।
क्या 2027 से पहले नई कांग्रेस तैयार होगी?
हरीश रावत का उत्तराखंड कांग्रेस में योगदान बड़ा रहा है। इसे नजरअंदाज करना राजनीतिक रूप से सही नहीं होगा।
इसके बावजूद हर राजनीतिक दल को समय के साथ नई पीढ़ी तैयार करनी पड़ती है। उत्तराखंड कांग्रेस भी अब उसी मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है।
हरीश रावत के पीछे हटने से गणेश गोदियाल को अधिक राजनीतिक जगह मिल सकती है। हालांकि, इसके बाद परिणाम देने की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर बढ़ेगी।
वहीं, कुमारी सैलजा को यह सुनिश्चित करना होगा कि संगठन फिर नए गुटों में न बंटे।
सबसे महत्वपूर्ण बात जमीनी कार्यकर्ताओं की भूमिका होगी। युवा कांग्रेस, सेवादल, महिला कांग्रेस, NSUI और दूसरे संगठनों को वास्तविक हिस्सेदारी देनी होगी।
साथ ही, विवादों और गंभीर जांच का सामना कर रहे नेताओं के मामले में कांग्रेस को स्पष्ट नीति अपनानी होगी।
यदि पार्टी ऐसा करती है, तो मौजूदा घटनाक्रम संकट के बजाय अवसर बन सकता है।
आखिरकार 2027 की लड़ाई केवल बड़े चेहरों से नहीं जीती जाएगी। बूथ स्तर का संगठन, साफ छवि वाले उम्मीदवार और एकजुट नेतृत्व ही कांग्रेस की असली परीक्षा होंगे।
Voice of Nation Political Desk