ED के घेरे में दो ‘रावत’, सड़क पर सियासत तेज: क्या रैलियों और जनसमर्थन से जांच एजेंसियों पर बन सकता है राजनीतिक दबाव?
क्या कांग्रेस से टकराव के पीछे हरदा की कोई ‘Exit Strategy’? ED, BJP और पुराना ‘Washing Machine’ रिकॉर्ड बढ़ा रहा सियासी सवाल
देहरादून | Voice of Nation Special Report | By Chief Editor | 6.10.2026 | 3.29 PM
उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के दो बड़े नेताओं हरीश रावत और हरक सिंह रावत से जुड़े अलग-अलग मामलों में ED की कार्रवाई राजनीतिक बहस के केंद्र में है।

एक तरफ पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत से 2016 की VPDO भर्ती परीक्षा से जुड़े मामले में ED पूछताछ कर चुकी है। उनके तत्कालीन OSD और वर्तमान सहयोगी चंदन सिंह जीना के यहां भी एजेंसी ने तलाशी ली थी। हरीश रावत ने कार्रवाई को चुनाव से पहले राजनीतिक दबाव से जोड़ा और सरकार पर बदले की भावना से काम करने का आरोप लगाया।
यह भी पढ़े :-बहुगुणा की दिल्ली वापसी की चर्चा के बीच क्या हरदा खोलेंगे पुराने OSD की फाइलें? https://x.com/voiceofnation18/status/2105431011236704356?s=46
दूसरी तरफ पूर्व मंत्री हरक सिंह रावत और उनकी पत्नी दीप्ति रावत के खिलाफ ED जुलाई 2025 में देहरादून की जमीन से जुड़े मनी-लॉन्ड्रिंग मामले में अभियोजन शिकायत/चार्जशीट दाखिल कर चुकी है। इसमें उनके कथित सहयोगी बीरेंद्र सिंह कंडारी, लक्ष्मी सिंह राणा और श्रीमती पूर्णा देवी मेमोरियल ट्रस्ट को भी आरोपी बनाया गया। आरोपों पर अंतिम निर्णय अदालत को करना है।
हरक सिंह के मामले में ED का दावा क्या है?
ED का आरोप है कि देहरादून में दो जमीनों को लेकर साजिश रची गई और उन्हें कथित तौर पर सरकारी सर्किल रेट से काफी कम कीमत पर दीप्ति रावत तथा लक्ष्मी राणा के नाम कराया गया। और मृतक जमीन के मालिक की पॉवर ऑफ़ अटॉर्नी से रजिस्ट्री का मामला चर्चाओं में रहा ।
एजेंसी के अनुसार इन जमीनों का इस्तेमाल बाद में Doon Institute of Medical Sciences से जुड़ी गतिविधियों में हुआ। जनवरी 2025 में ED ने करीब 101 बीघा जमीन को अस्थायी रूप से अटैच भी किया था। एजेंसी ने इसका सरकारी मूल्य लगभग ₹6.56 करोड़ और बाजार मूल्य ₹70 करोड़ से अधिक बताया था।
इसलिए हरक सिंह का मामला केवल किसी राजनीतिक बयान तक सीमित नहीं है—ED अदालत में शिकायत दाखिल करने के चरण तक पहुंच चुकी है।
फरवरी 2024 में हरक सिंह के ठिकानों पर हुई थी छापेमारी
हरक सिंह रावत से जुड़ी ED कार्रवाई की शुरुआत इससे पहले हो चुकी थी।
7 फरवरी 2024 को एजेंसी ने उत्तराखंड, दिल्ली और चंडीगढ़ में कई ठिकानों पर तलाशी ली थी। उस समय जांच के तार जमीन संबंधी मामले के अलावा कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में कथित अवैध गतिविधियों से भी जुड़े बताए गए थे।
कॉर्बेट मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2024 में अवैध निर्माण और पेड़ों की कटाई को लेकर गंभीर टिप्पणियां की थीं और पूर्व वन मंत्री हरक सिंह रावत तथा तत्कालीन DFO किशन चंद के संदर्भ में भी कड़ी टिप्पणी सामने आई थी।
दूसरी तरफ हरीश रावत—OSD से जांच पूर्व मुख्यमंत्री तक
हरीश रावत से जुड़ा मामला अलग है।
ED की जांच 2016 की UKSSSC VPDO भर्ती परीक्षा में कथित अनियमितताओं से संबंधित है। उनके तत्कालीन OSD चंदन सिंह जीना के यहां तलाशी के बाद एजेंसी की कार्रवाई राजनीतिक रूप से ज्यादा चर्चित हुई। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार ED ने जीना के यहां ₹32 लाख नकद, सोना और महंगी घड़ियां मिलने का दावा किया।
ये भी पढ़े:-
STAY के बीच कैसे बन गई SUBHARTI UNIVERSITY?
https://x.com/voiceofnation18/status/2101651096049795506?s=46
इसके बाद 26 सितंबर को हरीश रावत स्वयं ED के सामने पेश हुए और करीब पांच घंटे उनसे पूछताछ हुई। रावत ने बाद में इस कार्रवाई को आगामी विधानसभा चुनाव से जोड़ते हुए राजनीतिक प्रतिशोध का आरोप लगाया।
यानी दोनों नेताओं के मामले कानूनी रूप से अलग-अलग हैं, लेकिन राजनीतिक तस्वीर दिलचस्प है—उत्तराखंड कांग्रेस के दो बेहद चर्चित चेहरे और दोनों के आसपास ED की कार्रवाई।
फिर सड़क की राजनीति क्यों हो रही है तेज?
यहीं से एक बड़ा राजनीतिक सवाल पैदा होता है।
हरीश रावत कांग्रेस नेतृत्व की आपत्तियों के बावजूद अपनी जनसंवाद यात्रा को लेकर सक्रिय हैं। दूसरी ओर हरक सिंह रावत भी ED-CBI और मुकदमों को लेकर सार्वजनिक रूप से राजनीतिक जवाब देते रहे हैं।
क्या जांच एजेंसियों की कार्रवाई के बीच बड़े जनसमूह, यात्राओं, रैलियों और राजनीतिक प्रदर्शनों के जरिए यह संदेश देने की कोशिश होती है कि संबंधित नेता के पीछे बड़ा जनसमर्थन मौजूद है?
और यदि ऐसा है, तो क्या उसका उद्देश्य केवल मतदाताओं और पार्टी नेतृत्व को संदेश देना है—या जांच एजेंसियों की कार्रवाई को भी राजनीतिक मुद्दा बनाना?
इन सवालों का उत्तर प्रमाण के बिना नहीं दिया जा सकता। लेकिन इतना स्पष्ट है कि दोनों नेता जांच को केवल कानूनी दायरे में नहीं छोड़ रहे; वे सार्वजनिक और राजनीतिक स्तर पर भी अपना पक्ष रख रहे हैं। हरीश रावत ने तो ED कार्रवाई को चुनावी चिंता और राजनीतिक प्रतिशोध से सीधे जोड़ा है।
क्या जनसमर्थन ED की कानूनी कार्रवाई रोक सकता है?
कानूनी स्थिति यहां राजनीति से अलग है।
रैली, यात्रा या जनसमर्थन अपने आप किसी PMLA जांच, चार्जशीट या अदालत की कार्यवाही को समाप्त नहीं करता। हरक सिंह रावत के मामले में तो ED अभियोजन शिकायत अदालत में दाखिल कर चुकी है। फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में मामला तेज़ी से चलना है
इसी तरह हरीश रावत के मामले में राजनीतिक बयान और यात्राएं अपनी जगह हैं, जबकि ED की जांच अपनी कानूनी प्रक्रिया के तहत चल रही है।
इसलिए राजनीतिक रूप से चाहे जितना शक्ति प्रदर्शन हो, अंततः जांच एजेंसी को अपने आरोप साक्ष्यों के आधार पर और आरोपियों को अपना बचाव कानून के आधार पर करना होगा।
यही आने वाले महीनों में उत्तराखंड की राजनीति का सबसे दिलचस्प संघर्ष बन सकता है—एक तरफ ED की फाइलें, दूसरी तरफ सड़क पर राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन और बीच में 2027 का विधानसभा चुनाव।
क्या कांग्रेस से टकराव के पीछे हरदा की कोई ‘Exit Strategy’?
ED, BJP और पुराना ‘Washing Machine’ रिकॉर्ड बढ़ा रहा सियासी सवाल ?
उत्तराखंड में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की ‘धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा’ अब महज एक यात्रा नहीं रही। कांग्रेस प्रभारी कुमारी सैलजा के स्पष्ट निर्देश और संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल की चेतावनी के बावजूद रावत ने अपना कार्यक्रम जारी रखा। वेणुगोपाल ने साफ कहा कि उत्तराखंड में व्यक्तिगत अभियान स्वीकार नहीं किए जाएंगे और कार्यक्रम सामूहिक रूप से पार्टी संगठन के तहत चलेंगे।
अब बड़ा सवाल उठ रहा है—हरीश रावत आखिर कांग्रेस हाईकमान से इतना सीधा टकराव क्यों ले रहे हैं?
क्या वह केवल अपना राजनीतिक अस्तित्व और प्रभाव दिखाना चाहते हैं, या इसके पीछे कोई और रणनीति है?
यह भी पढ़े:-पूर्व CM के पूर्व OSD चंदन जीना के घर ED की छापेमारी, अब जांच का दायरा कहां तक? पुराने सहयोगियों पर फिर उठे सवाल https://voiceofnationnews.com/chandan-jeena-ed-raid-harish-rawat-osd/
ED की एंट्री के बाद अचानक क्यों बदला राजनीतिक तापमान?
इस सवाल को इसलिए भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि रावत की हालिया राजनीतिक सक्रियता उस समय बढ़ी है जब 2016 की भर्ती परीक्षा से संबंधित मनी-लॉन्ड्रिंग जांच उनके पुराने OSD/सहयोगी चंदन सिंह जीना तक पहुंची और ED ने स्वयं रावत से भी पूछताछ की।
दिलचस्प यह है कि अपनी मौजूदा यात्रा के दौरान रावत ने स्वयं कहा है कि ED और BJP ने उनके “आत्मसम्मान को कुरेदा” है और उन्हें उससे भी लड़ना है। यानी ED का मुद्दा उनकी मौजूदा राजनीतिक मुहिम से पूरी तरह अलग नहीं है—कम से कम रावत स्वयं इसे अपने राजनीतिक संघर्ष के संदर्भ में रख रहे हैं।
लेकिन यहां से एक दूसरा और कहीं बड़ा राष्ट्रीय सवाल पैदा होता है।
ED के बाद BJP: देश में पहले भी दिख चुका है यह पैटर्न
यह केवल विपक्ष का राजनीतिक नारा नहीं है। The Indian Express की अप्रैल 2024 की एक विस्तृत जांच में पाया गया था कि 2014 के बाद केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई का सामना कर रहे 25 प्रमुख विपक्षी नेता BJP में गए और उनमें से 23 मामलों में बाद में किसी न किसी प्रकार की राहत दिखाई दी—तीन मामले बंद हुए जबकि 20 जांचें रुकीं या ठंडे बस्ते जैसी स्थिति में पहुंचीं। हालांकि कुछ नेताओं के मामले जारी भी रहे; इसलिए BJP में जाना कानूनी तौर पर जांच समाप्त होने की गारंटी नहीं है।
विपक्ष इसी राजनीतिक पैटर्न को लंबे समय से BJP की कथित “वॉशिंग मशीन” कहता रहा है। BJP और जांच एजेंसियां राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोपों को खारिज करती रही हैं।
अब यही राष्ट्रीय पृष्ठभूमि उत्तराखंड में एक नया सवाल पैदा करती है—
क्या कांग्रेस हाईकमान से लगातार टकराव के जरिए हरीश रावत ऐसी परिस्थिति बना रहे हैं जिसमें पार्टी स्वयं उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करे?
और यदि ऐसा हुआ तो क्या भविष्य में उनके सामने BJP या कोई दूसरा राजनीतिक रास्ता खुल सकता है?
फिलहाल इसका कोई प्रमाण नहीं है। न BJP ने उन्हें कोई प्रस्ताव देने की घोषणा की है और न हरीश रावत ने BJP में जाने का संकेत दिया है। इसलिए इसे अभी सियासी संभावना नहीं बल्कि जांच योग्य राजनीतिक सवाल ही माना जाना चाहिए।
लेकिन एक तथ्य हरदा के सामने भी खड़ा है—लगातार चुनावी पराजय
हरीश रावत कभी उत्तराखंड कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली नेताओं में रहे हैं। पांच बार सांसद रहे, केंद्रीय मंत्री बने और मुख्यमंत्री भी रहे। लेकिन पिछले लगभग एक दशक का उनका व्यक्तिगत चुनावी रिकॉर्ड कमजोर रहा है।
2017 विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री रहते हुए वह हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा—दोनों सीटों से हार गए।
2019 लोकसभा चुनाव में नैनीताल-ऊधमसिंह नगर से उन्हें BJP के अजय भट्ट ने 3,39,096 वोटों के अंतर से हराया। इसके बाद 2022 विधानसभा चुनाव में लालकुआं से BJP के मोहन सिंह बिष्ट ने उन्हें 17,527 वोटों से पराजित किया।
इसलिए यह कहना तथ्य नहीं होगा कि उनका “कोई जनाधार नहीं बचा”, क्योंकि वर्तमान जनाधार का कोई ताजा विश्वसनीय सर्वे हमारे सामने नहीं है। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि हाल के बड़े चुनावों में उनका व्यक्तिगत चुनावी प्रदर्शन लगातार कमजोर रहा है।
यहीं इस पूरी कहानी का राजनीतिक विरोधाभास सामने आता है।
हाईकमान को चुनौती देकर आखिर हासिल क्या होगा?
यदि हरीश रावत कांग्रेस संगठन से अलग अपनी राजनीतिक ताकत प्रदर्शित करना चाहते हैं तो सबसे बड़ा पैमाना भीड़ नहीं बल्कि चुनावी परिणाम होंगे।
और यदि कोई यह कल्पना करे कि भविष्य में वह BJP की ओर जा सकते हैं, तब भी एक सवाल अपनी जगह रहेगा—BJP में उनकी राजनीतिक भूमिका क्या होगी?
इसका उत्तर फिलहाल किसी के पास नहीं है। उन्हें मंत्री, मुख्यमंत्री, विधायक या कोई दूसरा पद मिलेगा—ऐसा कोई दावा तथ्य के आधार पर नहीं किया जा सकता।
इसीलिए कांग्रेस से टकराव को सीधे “BJP में जाने की तैयारी” घोषित करना जल्दबाजी होगी।
लेकिन घटनाक्रम असाधारण जरूर है।
कुमारी सैलजा ने 1 अक्टूबर को उन्हें यात्रा रोकने के लिए लिखा। रावत नहीं माने। कांग्रेस ने कहा कि यात्रा न सैलजा से चर्चा करके निकाली गई और न प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल से। सैलजा ने अब रावत से स्पष्टीकरण मांगे जाने की बात कही है।
इसके बाद वेणुगोपाल ने और स्पष्ट शब्दों में कहा—व्यक्तिगत अभियान बर्दाश्त नहीं होंगे।
फिर भी हरदा यात्रा पर हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल: कांग्रेस हरदा पर कार्रवाई करेगी या हरदा पीछे हटेंगे?
यही इस कहानी का अगला अध्याय है।
रावत के अनुसार यात्रा पूरी होने के बाद वह 7 अक्टूबर को दिल्ली जाकर के.सी. वेणुगोपाल और कुमारी सैलजा से मिलेंगे।
उस बैठक के बाद तीन चीजों पर नजर रहेगी—क्या कांग्रेस उनसे औपचारिक स्पष्टीकरण लेकर मामला समाप्त करती है, क्या उनके स्वतंत्र कार्यक्रमों पर रोक लगती है, या टकराव अनुशासनात्मक कार्रवाई की तरफ बढ़ता है।
और यदि कांग्रेस के साथ यह दूरी और बढ़ती है, तभी वह सवाल वास्तविक राजनीतिक महत्व हासिल करेगा जो अभी केवल चर्चा है
क्या हरदा कांग्रेस के भीतर अपनी आखिरी राजनीतिक लड़ाई लड़ रहे हैं, या अपने लिए कोई नया रास्ता तैयार कर रहे हैं?
फिलहाल एक बात प्रमाणित है: ED जांच, कांग्रेस हाईकमान से टकराव और 2027 से ठीक पहले हरीश रावत की व्यक्तिगत राजनीतिक सक्रियता—तीनों घटनाक्रम एक ही समय पर चल रहे हैं। इनके बीच किसी गुप्त राजनीतिक समझौते का अभी कोई प्रमाण सामने नहीं आया है।
और शायद इसीलिए 7 अक्टूबर की दिल्ली बैठक अब उत्तराखंड कांग्रेस की सामान्य संगठनात्मक बैठक से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है।