इंस्पेक्टर नरेश राठौर फिर सवालों के घेरे में: ACJM-II का स्वतंत्र जांच का आदेश, सहसपुर की पुरानी जांच से High Court तक—क्या अब Police Headquarters खोलेगा पूरा रिकॉर्ड?

एक ही क्षेत्र में लंबी तैनाती का सवाल

VOICE OF NATION SPECIAL REPORT | 11.09.2026 | 11:00 IST

इंस्पेक्टर नरेश राठौर फिर सवालों के घेरे में: ACJM-II का स्वतंत्र जांच का आदेश, सहसपुर की पुरानी जांच से High Court तक—क्या अब Police Headquarters खोलेगा पूरा रिकॉर्ड?

देहरादून। देहरादून पुलिस के इंस्पेक्टर नरेश सिंह राठौर से जुड़े एक नए मामले में ACJM-II, देहरादून के विस्तृत न्यायिक आदेश के बाद उनकी कार्यप्रणाली ही नहीं बल्कि उनकी पुरानी विवेचनाओं, सहसपुर कार्यकाल, विभागीय जांचों और लंबे समय से देहरादून तथा आसपास की postings को लेकर भी कई सवाल सामने आ रहे हैं।

10 सितंबर 2026 के आदेश  में माननीय एसीजेएम -II संजीव कुमार की अदालत ने उपलब्ध सामग्री पर विचार करते हुए धारा 175(3) BNSS के तहत प्रार्थना-पत्र स्वीकार किया और मामले में विधिवत तथा निष्पक्ष अन्वेषण सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।

Naresh Rathore ACJM Order के बाद क्यों उठ रहे हैं सवाल?

Honble ACJM 2 Order

Naresh Rathor septemeber 2026 Orderपढ़िये पूरा न्यायालय का आदेश :-

  1. हालांकि मामला और संवेदनशील इसलिए है क्योंकि आरोप स्वयं पुलिसकर्मियों की भूमिका से संबंधित हैं। न्यायालय ने जांच Inspector से वरिष्ठ अधिकारी से कराने की व्यवस्था की है।

वर्तमान मामले में मारपीट, दबाव और पुलिस अधिकारों के दुरुपयोग के आरोप

  1. वहीं न्यायालय के सामने रखे गए प्रार्थना-पत्र में शिकायतकर्ताओं ने पुलिस द्वारा कथित रूप से दबाव बनाने, थाने बुलाने, मारपीट, उत्पीड़न और 20 लाख रुपये के कथित समझौते के लिए दबाव डालने जैसे गंभीर आरोप लगाए।

 महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि न्यायालय ने सामग्री का परीक्षण करने के बाद प्रथम दृष्टया विभिन्न cognizable offences बनना परिलक्षित माना और वास्तविक तथ्य सामने लाने के लिए विधिवत investigation आवश्यक समझी ।

इस न्यायिक हस्तक्षेप ने एक सामान्य नागरिक के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश दिया है—यदि शिकायत पुलिस अधिकारी के विरुद्ध भी हो, तो न्यायालय के दरवाजे उसके लिए खुले हैं।

2018 में  एक मामला उत्तराखंड   High Court तक भी पहुंचा था

नरेश राठौर से संबंधित एक पुराना न्यायिक रिकॉर्ड भी सामने आता है।

Naresh Singh Rathod v. Uttarakhand Minority Commission and Others, WPMS No.3485 of 2018 में Uttarakhand High Court के समक्ष नरेश सिंह राठौर स्वयं petitioner थे और judgment में उन्हें Station Officer, Police Station Sahaspur, District Dehradun बताया गया है।

उस मामले की पृष्ठभूमि में एक महिला द्वारा Uttarakhand Minority Commission के समक्ष Rathore के हाथों harassment का आरोप लगाने वाली complaint भी थी।

  1. इसके अलावा High Court ने किसी misconduct को सिद्ध घोषित नहीं किया। लेकिन तत्कालीन Justice Sudhanshu Dhulia ने DGP Uttarakhand को महिला की complaint पर विचार करने और यदि उचित लगे तो matter को Police Complaint Authority जैसी higher authority के पास भेजने पर विचार करने का निर्देश दिया था। DGP को पहले से उपलब्ध reports और सभी संबंधित व्यक्तियों के versions पर भी विचार करने को कहा गया था।

यह distinction जरूरी है—2018 का High Court order नरेश राठौर को दोषी ठहराने वाला आदेश नहीं था। लेकिन यह उनके Sahaspur tenure से जुड़ी complaint का ऐसा judicial record जरूर है जिसमें DGP-level consideration तक बात पहुंची।

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फिर 2022 में Sahaspur से Police Lines और departmental inquiry

चार साल बाद Sahaspur से ही एक और गंभीर घटनाक्रम सामने आया।

नवंबर 2022 की प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार एक महिला ने 29 अक्टूबर 2022 को Sahaspur Police Station में harassment की complaint दी थी। रिपोर्ट में आरोप था कि थाना स्तर पर complaint पर कार्रवाई नहीं हुई। 1 नवंबर को महिला की मृत्यु के बाद तत्कालीन SSP Dalip Singh Kunwar ने Sahaspur SO Naresh Rathore को Police Lines attach किया और inquiry स्थापित की।

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लेकिन आज, लगभग चार वर्ष बाद, एक बिल्कुल वैध सवाल है:

2022 में नरेश राठौर के खिलाफ बैठाई गई departmental inquiry का अंतिम निष्कर्ष क्या था?

क्या उन्हें clean chit मिली?

क्या misconduct पाया गया?

क्या departmental action हुआ?

या inquiry बिना किसी final conclusion के बंद हो गई?

यदि बाद में उन्हें पुनः महत्वपूर्ण field postings दी गईं तो उस inquiry की final report posting authority के सामने रखी गई थी या नहीं?

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इन सवालों का जवाब अब Uttarakhand Police Headquarters के official records से आना चाहिए।

एक ही क्षेत्र में लंबी तैनाती का सवाल

Public records कम से कम इतना establish करते हैं कि नरेश राठौर  2014 में प्रेम नगर थाने में , 2018 में Sahaspur के Station Officer थे, 2022 में भी Sahaspur SO के रूप में public reporting में दिखाई देते हैं और बाद में Dehradun district की अन्य महत्वपूर्ण postings में भी उनका नाम सामने आता रहा।

इसलिए अब उनकी complete service-posting history सामने आना आवश्यक है

2014 से सितंबर 2026 तक नरेश सिंह राठौर Dehradun district, Dehradun Range और आसपास की किन-किन police stations, chowkies, branches और units में तैनात रहे? प्रत्येक posting कितने समय की थी? कितनी बार district/range से बाहर भेजे गए? और प्रत्येक transfer तथा re-posting का competent authority कौन था?

अगर कोई निर्धारित tenure पूरा होने के बाद भी उसी district/range में रहा तो क्या उसके लिए relaxation/retention order जारी हुआ?

यही official records बताएंगे कि posting pattern सामान्य था या असामान्य।

पुरानी अदालत की जिरह अब और महत्वपूर्ण

इसके साथ नरेश राठौर की एक पुराने criminal case में हुई sworn cross-examination भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

उन्होंने न्यायालय में स्वीकार किया था कि उन्होंने पूर्व विवेचकों पर पूर्ण विश्वास किया था।  यानी सिर्फ़ स्वयं जाँच न कर अवलोकन किया था ।

कई महत्वपूर्ण documents स्वयं संबंधित departments से प्राप्त करने के बजाय predecessor IO द्वारा case diary में रखे records पर reliance की बात भी उनके evidence में सामने आती है।

और सबसे महत्वपूर्ण—संबंधित FIR No.182/2011 की जानकारी के प्रश्न पर उनका उत्तर “जी नहीं” लिखा है यानी की  एक ही केस में हाई कोर्ट के दो FIR पर कनेक्ट करते हुए जाँच के आदेश थे तो यानी सही जाँच नहीं की गई ।

तो क्या जल्दबाज़ी में 2 दिन में ही फाइनल कर दी जाँच

दूसरी तरफ उन्होंने यह भी कहा कि final report के बाद उन्होंने case diary/material का अध्ययन करके charge-sheet प्रस्तुत की।  और 2 दो दिन में आरोप पत्र दाखिल कर दिया यानी 17.05.2014 को अंतिम रिपोर्ट निरस्त की और 19.05.2014 को चार्ज शीट फाइल कर दी जो बहुत संदेह पैदा करता है की जब और्व जाँच अधिकारी में अंतिम रिपोर्ट में लिखा की मामला संपति और लेनदेन का है सिविल नेचर का है और सिविल केस लंबित है तो हाई कोर्ट  से कनेक्टेड दोनों केसो में से एक में चार्जशीट कैसे लग गई और दूसरे में FR? वॉयस ऑफ़ नेशन के पास यह प्रमाण उपलब्ध है ।

इसीलिए सवाल उठता है:

पूरी case diary/material देखने के बावजूद एक संबंधित FIR की जानकारी investigation में क्यों नहीं आई?

और यदि subsequent IO ने predecessor IO पर “पूर्ण विश्वास” किया था तो independent investigation और independent application of mind का स्तर क्या था?

इन sworn answers के बाद investigation की quality और independence की supervisory examination मांगना पूरी तरह legitimate public-interest question है।

अब SSP और Police Headquarters से ये सवाल

अब केवल वर्तमान complaint की जांच पर्याप्त नहीं होगी। उपलब्ध पुराने records के मद्देनजर Uttarakhand Police leadership को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि:

  1. ACJM-II के वर्तमान आदेश का compliance किस senior officer को दिया गया है और investigation की समय-सीमा क्या होगी?
  2. प्रथम दृष्टया cognizable offences सामने आने की judicial observation के बाद FIR registration पर क्या कार्रवाई की गई?
  3. निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए क्या संबंधित officer को ऐसी operational position से अलग किया जाएगा जहां witnesses, records या subordinate staff पर प्रभाव की आशंका हो?क्यूँकि आम स्तर पर पुलिस किसी पर मुकदमा दर्ज जार यह कहती है की यह गवाह तोड़ सकता है और पार्टी को कस्टडी करवा देती है तो क्या यही नियम पुलिस पर भी पुलिस द्वारा लागू होता है ?
  4. क्या investigation local police hierarchy के बजाय स्वतंत्र senior officer अथवा specially constituted team करेगी?
  5. 2018 के Uttarakhand High Court order के बाद DGP ने complaint पर क्या निर्णय लिया था और क्या Police Complaint Authority को कोई reference भेजा गया?
  6. 2022 Sahaspur departmental inquiry का final outcome क्या था?
  7. यदि 2022 inquiry में कोई adverse material था तो subsequent field postings देते समय उसका consideration हुआ या नहीं?
  8. 2014 से 2026 तक नरेश राठौर की complete district, range, police station और branch-wise posting history क्या है?
  9. क्या किसी posting/retention के लिए सामान्य transfer/tenure policy से relaxation दिया गया था? यदि हां, किस authority ने और किस recorded reason से?
  10. पुराने criminal case की sworn cross-examination में सामने आए पूर्व IO पर पूर्ण विश्वास, independent departmental verification और संबंधित FIR की जानकारी न होने जैसे तथ्यों को देखते हुए क्या उनकी संबंधित पुरानी investigations का supervisory audit कराया जाएगा?
  11. क्या ऐसी review केवल एक मामले तक सीमित रहेगी या उन complaints/investigations को भी देखा जाएगा जहां उनकी investigative conduct पहले judicial अथवा departmental scrutiny में आई?
  12. यदि वर्तमान स्वतंत्र जांच में किसी police officer के विरुद्ध cognizable offence के पर्याप्त evidence मिलते हैं तो क्या criminal prosecution के साथ departmental proceedings भी शुरू की जाएंगी?

सबसे बड़ा प्रश्न फिर वही—पुलिस के खिलाफ पुलिस की जांच कितनी स्वतंत्र?

कानून में police officer के खिलाफ investigation पुलिस द्वारा किया जाना अपने-आप में अवैध नहीं है। लेकिन जहां आरोप उसी district police के serving officer पर हों, वहां institutional independence दिखाई देना भी आवश्यक है।

2014 मे तो प्रमाणित है पर क्या से पहले भी देहरादून पोस्टिंग रही ?

2018 में High Court तक complaint पहुंची।

2022 में Sahaspur से Police Lines attachment और departmental inquiry हुई। 

अब 2026 में ACJM-II ने एक अलग मामले में Inspector से वरिष्ठ अधिकारी से विधिवत investigation की आवश्यकता महसूस की है।

2014 से 2026 तक देहरादून जनपद ही ?

दूसरी तरफ इन तीनों घटनाओं को guilt की श्रृंखला नहीं कहा जा सकता—लेकिन इन्हें एक-दूसरे से बिल्कुल असंबंधित मानकर नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा।

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इसीलिए स्वतंत्र senior-level investigation और complete service/inquiry record का examination सबसे विश्वसनीय रास्ता है।

न्यायपालिका ने रास्ता दिखाया, अब परीक्षा पुलिस प्रशासन की

माननीय न्यायालय एसीजेएम-II का वर्तमान आदेश किसी व्यक्ति की conviction नहीं है। लेकिन जब न्यायालय प्रथम दृष्टया cognizable offences का प्रश्न पाता है और independent senior-level investigation आवश्यक समझता है, तो आदेश का compliance केवल कागजी औपचारिकता बनकर नहीं रहना चाहिए बल्कि सुप्रीम कोर्ट की रूलिंग ललिता कुमारी बनाम अन्य जो की माननीय न्यायालय के आदेश में भी उल्लिखित है  तो क्या उसके अनुसार पहले नरेश राठौर को पद से हटाना चाहिए और फिर FIR दर्ज होनी चाहिए ? जिससे निष्पक्ष जाँच हो और उसके बाद कानून के अनुसार जिम्मेदारी तय हो।

इसके बावजूद Voice of Nation की मांग किसी  दरअसल  किसी ऑफिसर   को बिना जांच दोषी ठहराने की नहीं है।

इसलिए मांग केवल इतनी है कि 2014 या उससे पहले देहरादून पोस्टिंग, 2018 High Court record जिसमे देहरादून पोस्टिंग, 2022 Sahaspur , district Dehradun , लंबी posting history, पुरानी sworn testimony और साथ ही अब 2026 के ACJM-II order—इन सभी उपलब्ध records को देखते हुए Police Headquarters एक transparent और independent supervisory review कराए।

  1. इस बीच SSP dehradun द्वारा हाल ही में किए गए कई ट्रांसफर लिस्ट में भी कई नाम ऐसे है जिनका काफ़ी समय से जनपद देहरादून में ही होना दिखा है जैसे थाना dalanwala के हाल ही में प्रभारी बने विनोद गुसाईं के बारे में भी पता करना आवश्यक होगा कि उनकी भी 2012 से अब तक देहरादून जनपद और आसपास कहाँ कहाँ पोस्टिंग रही है ?  और  SI प्रवीण पुंडीर भी कहाँ कहाँ पोस्टिंग रही है । 
Transfers in Police Department

क्योंकि पुलिस पर जनता का विश्वास तभी कायम रहता है जब पुलिस अपने ही अधिकारी के खिलाफ शिकायत की जांच भी इसी क्रम में,उतनी ही निष्पक्षता से करे जितनी किसी सामान्य नागरिक के खिलाफ करती है।

न्यायपालिका ने अपना दायित्व निभाया है। अब जवाबदेही की परीक्षा पुलिस प्रशासन की है।

Disclaimer:

  1. दूसरी ओर यह रिपोर्ट न्यायालयीन अभिलेखों, न्यायालय में दर्ज गवाही और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध reports पर आधारित है। किसी pending criminal revision अथवा अन्य proceeding के merits पर कोई निष्कर्ष व्यक्त नहीं किया गया है। 2018 High Court proceeding और 2022 departmental inquiry का उल्लेख किसी दोषसिद्धि के रूप में नहीं किया गया है। संबंधित अधिकारी तथा Uttarakhand Police का पक्ष प्राप्त होने पर उसे उचित प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

 

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