15 साल की कानूनी लड़ाई में आचार्य बालकृष्ण को बड़ी राहत, CBI कोर्ट ने किया बरी

पतंजलि के महामंत्री को फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्र और पासपोर्ट मामले में राहत; लंबे मुकदमे के बाद आरोप साबित नहीं कर सका अभियोजन

15 साल की कानूनी लड़ाई में आचार्य बालकृष्ण को बड़ी राहत, CBI कोर्ट ने किया बरी

पतंजलि के महामंत्री को फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्र और पासपोर्ट मामले में राहत; लंबे मुकदमे के बाद आरोप साबित नहीं कर सका अभियोजन

Category राष्ट्रीय / उत्तराखंड Image Alt Text आचार्य बालकृष्ण CBI कोर्ट देहरादून से बरी
Sub Title कथित फर्जी दस्तावेज और पासपोर्ट मामले में करीब 15 साल बाद फैसला, लंबे कानूनी संघर्ष के बाद पतंजलि के आचार्य बालकृष्ण को बड़ी राहत

देहरादून, 7 सितंबर 2026 | Voice of Nation | 7:31 PM IST

पतंजलि योगपीठ के महामंत्री और आयुर्वेद के क्षेत्र में चर्चित नाम आचार्य बालकृष्ण को सोमवार को बड़ी कानूनी राहत मिली। देहरादून की विशेष CBI अदालत ने करीब 15 वर्ष पुराने कथित फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्र और पासपोर्ट से जुड़े मामले में उन्हें बरी कर दिया। सह-आरोपी नरेश चंद्र द्विवेदी को भी अदालत ने दोषमुक्त किया है। 

यह मामला वर्ष 2011 से चला आ रहा था। आचार्य बालकृष्ण पर आरोप लगाया गया था कि भारतीय पासपोर्ट प्राप्त करने के दौरान कथित तौर पर फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया। CBI ने 24 जुलाई 2011 को मामला दर्ज किया था और जुलाई 2012 में अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया था। लेकिन लंबी सुनवाई के बाद अभियोजन आरोपों को अदालत में सिद्ध नहीं कर सका और अदालत ने बालकृष्ण को बरी कर दिया। 

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करीब डेढ़ दशक बाद आया फैसला

इस मुकदमे ने आचार्य बालकृष्ण का करीब डेढ़ दशक तक पीछा किया। मामले में उन्हें वर्ष 2012 में आत्मसमर्पण करना पड़ा था और लगभग 27 दिन जेल में रहने के बाद जमानत मिली थी। इसके बावजूद कानूनी प्रक्रिया वर्षों तक चलती रही। सोमवार का फैसला इसलिए उनके लिए व्यक्तिगत और संस्थागत दोनों स्तर पर महत्वपूर्ण राहत माना जा रहा है। 

आचार्य बालकृष्ण के खिलाफ मुख्य रूप से IPC की धारा 471 और Passport Act, 1967 की धारा 12(1)(b) के तहत मामला चला था। सह-आरोपी नरेश चंद्र द्विवेदी के खिलाफ सार्वजनिक रिकॉर्ड से संबंधित कथित जालसाजी का आरोप भी था। 

लंबी कानूनी लड़ाई के बीच जारी रखा काम

इस मामले का एक दूसरा पहलू भी महत्वपूर्ण है। करीब 15 वर्ष तक आपराधिक मुकदमे का सामना करने के बावजूद आचार्य बालकृष्ण पतंजलि से जुड़ी अपनी जिम्मेदारियों और आयुर्वेद, औषधीय पौधों तथा भारतीय पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों से जुड़े कार्यों में सक्रिय रहे।

आचार्य बालकृष्ण को विशेष रूप से जड़ी-बूटियों और आयुर्वेद के क्षेत्र में उनके कार्यों के लिए जाना जाता है। पतंजलि के विस्तार में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसलिए इतने लंबे समय से चले आ रहे आपराधिक मुकदमे में बरी होना उनके सार्वजनिक और संस्थागत जीवन के लिए महत्वपूर्ण घटनाक्रम है।

अदालत का फैसला एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को भी रेखांकित करता है—किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप लगना और अदालत में उसका दोष सिद्ध होना दो अलग बातें हैं।

इस मामले में भी आचार्य बालकृष्ण पर गंभीर आरोप लगाए गए थे और CBI ने चार्जशीट दाखिल की थी, लेकिन अंततः न्यायिक प्रक्रिया के बाद अदालत ने उन्हें दोषमुक्त कर दिया। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार करीब 15 साल चली सुनवाई के बाद prosecution आरोपों को साबित नहीं कर सका। 

2018 में हाईकोर्ट से भी मिली थी पासपोर्ट संबंधी राहत

मुकदमे के दौरान एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम वर्ष 2018 में सामने आया था, जब उत्तराखंड हाईकोर्ट ने आचार्य बालकृष्ण को पासपोर्ट वापस लेने और उसका नवीनीकरण कराने की अनुमति दी थी। इसके बावजूद मूल मुकदमे की सुनवाई जारी रही और अब विशेष CBI अदालत का अंतिम फैसला सामने आया है। 

Patanjali और बालकृष्ण के लिए महत्वपूर्ण फैसला

आचार्य बालकृष्ण पिछले कई दशकों से योग गुरु बाबा रामदेव के प्रमुख सहयोगी रहे हैं और पतंजलि की संस्थागत तथा व्यावसायिक यात्रा में उनकी अहम भूमिका रही है।

आयुर्वेद और भारतीय पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक शोध, औषधीय पौधों की पहचान और बड़े स्तर पर उत्पादन से जोड़ने की पतंजलि की कोशिशों में बालकृष्ण एक प्रमुख चेहरा रहे हैं।

ऐसे में करीब डेढ़ दशक पुराने आपराधिक मामले से बरी होना उनके लिए केवल कानूनी राहत ही नहीं, बल्कि लंबे समय से उनके नाम के साथ जुड़े एक गंभीर आरोप से न्यायिक स्तर पर महत्वपूर्ण राहत भी है।

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15 साल बाद न्यायिक अध्याय का अहम पड़ाव

वर्ष 2011 में शुरू हुआ यह मामला उस समय राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया था। जांच, गिरफ्तारी, जमानत, आरोपों में बदलाव और वर्षों की अदालती सुनवाई के बाद अब विशेष CBI अदालत का फैसला आया है।

इस फैसले को आचार्य बालकृष्ण के लिए बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है।  आचार्य बालकृष्ण ने लगभग डेढ़ दशक तक इस मुकदमे का सामना किया और अब सक्षम अदालत ने उन्हें बरी कर दिया है।

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