मुख्यमंत्री धामी को अब क्या करना चाहिए?

दिल्ली की चर्चाएँ और उत्तराखंड

(संपादकीय )

मुख्यमंत्री धामी को अब क्या करना चाहिए?

नई दिल्ली/नागपुर/देहरादून: वॉयस ऑफ़ नेशन (मनीष वर्मा) उत्तराखंड की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि सरकार कब बदलेगी, बल्कि यह है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को अब क्या करना चाहिए। लगातार चल रही अफ़वाहों, साज़िशों और चुनावी माहौल के बीच मुख्यमंत्री के सामने यह समय रणनीतिक मजबूती का है, न कि केवल प्रतिक्रियात्मक राजनीति का।

अनुभवी राजनीतिक खिलाड़ियों की ज़रूरत

मुख्यमंत्री धामी को अब यह समझने की आवश्यकता है कि राजनीति केवल प्रशासन से नहीं चलती, बल्कि राजनीतिक प्रबंधन भी उतना ही ज़रूरी होता है।

उन्हें राजनीति के पुराने और अनुभवी खिलाड़ियों की एक मज़बूत टीम सलाहकार के रूप में जोड़नी चाहिए—ऐसे लोग जो उत्तराखंड की नब्ज़ समझते हों, केंद्र और राज्य दोनों स्तरों की राजनीति का अनुभव रखते हों और संकट के समय सही रणनीति सुझा सकें।

नारायण दत्त तिवारी जैसे नेताओं का दौर यह सिखाता है कि सत्ता में टिके रहने के लिए केवल ईमानदारी और मेहनत ही नहीं, बल्कि राजनीतिक चतुराई, संतुलन और समय पर निर्णय भी आवश्यक होते हैं।

सबसे कमज़ोर कड़ी: सोशल मीडिया

आज की राजनीति में मुख्यमंत्री धामी की सबसे कमज़ोर कड़ी सोशल मीडिया प्रबंधन के रूप में सामने आती है। अफ़वाहें सबसे पहले सोशल मीडिया पर जन्म लेती हैं, वहीं तेज़ी से फैलती हैं और वहीं से राजनीतिक नैरेटिव तय होता है। सरकार का पक्ष कई बार देर से या कमज़ोर तरीके से सामने आता है।

इसलिए अब समय आ गया है कि मुख्यमंत्री एक नई, पेशेवर और ज़मीनी समझ रखने वाली सोशल मीडिया टीम बनाएँ, जो—

  • तुरंत प्रतिक्रिया दे
  • अफ़वाहों का तथ्यात्मक खंडन करे
  • सरकार के कार्यों को आक्रामक लेकिन संतुलित ढंग से जनता तक पहुँचाए

यह टीम केवल पोस्ट डालने तक सीमित न हो, बल्कि नैरेटिव मैनेजमेंट करने वाली हो।

चुनावी वर्ष और BJP का anti-incumbency फ़ॉर्मूला

जैसे-जैसे 2027 के विधानसभा चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, राजनीतिक हमले और अफ़वाहें तेज़ होती जा रही हैं। इसी संदर्भ में यह समझना ज़रूरी है कि भारतीय जनता पार्टी ने अपनी चुनावी रणनीति के तहत देश के कई राज्यों में anti-incumbency को खत्म करने के लिए मुख्यमंत्री परिवर्तन का फ़ॉर्मूला आज़माया है।

इसके प्रमुख उदाहरण हैं—

  • गुजरात: 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले Vijay Rupani को हटाकर bhupendra patel को मुख्यमंत्री बनाया गया, ताकि लंबे समय से बन रही सरकार-विरोधी धारणा को कम किया जा सके।
  • त्रिपुरा: 2023 के चुनाव से पहले Viplav Kumar Deb की जगह Maanik Saha को आगे किया गया, जिससे पार्टी को नया चेहरा और नई ऊर्जा मिले।
  • उत्तराखंड: 2022 के चुनाव से ठीक पहले त्रिवेंद्र सिंह रावत और फिर तीरथ सिंह रावत के बाद पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री बनाया गया—जिसे anti-incumbency से निपटने की रणनीति के रूप में देखा गया।
  • हरियाणा: 2024 में लोकसभा चुनावों से पहले मनोहर लाल खट्टर की जगह नायाब सिंह सैनी को मुख्यमंत्री बनाया गया, ताकि सत्ता-विरोधी माहौल और सामाजिक समीकरणों को संतुलित किया जा सके।

इन उदाहरणों से साफ़ है कि पार्टी का यह फ़ॉर्मूला—“व्यक्ति नहीं, व्यवस्था”—anti-incumbency को समय रहते neutralize करने के लिए अपनाया गया है।

दिल्ली की चर्चाएँ और उत्तराखंड

सूत्रों के अनुसार, हाल के दिनों में नई दिल्ली में उत्तराखंड को लेकर भी चर्चाएँ तेज़ हुईं। कोटद्वार विधायक दिलीप सिंह रावत और विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूरी के नामों को लेकर कयास लगाए गए। इन चर्चाओं ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया कि क्या पार्टी संगठन में गढ़वाल-कुमाऊँ संतुलन साधने के लिए कोई प्रयोग किया जाएगा, या फिर कुमाऊँ से ही कोई नया नाम सामने आएगा।

हालाँकि, अभी यह सब अटकलों के दायरे में है, लेकिन चुनावी वर्ष में ऐसे कयास और तेज़ होना तय है।

निष्कर्ष

आज मुख्यमंत्री धामी के सामने चुनौती सरकार चलाने की नहीं, बल्कि सरकार को अस्थिर दिखाने वाली राजनीति और अफ़वाहों से निपटने की है। इसके लिए दो बातें सबसे ज़रूरी हैं—

  1. राजनीति के अनुभवी और विश्वसनीय लोगों को सलाहकार के रूप में जोड़ना और सबसे मिलना जुड़ना और बढ़ाना
  2. सोशल मीडिया की नई, सक्षम और आक्रामक टीम तैयार करना

यदि ये दोनों कदम समय रहते उठा लिए गए, तो न केवल अफ़वाहों पर लगाम लगेगी, बल्कि मुख्यमंत्री धामी चुनावी वर्ष में और अधिक मज़बूत और रणनीतिक स्थिति में खड़े दिखाई देंगे।

— संपादकीय

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