क्या यू के डी के वापसी के दिन आ गए ?
क्या यू के डी के वापसी के दिन आ गए ?
देहरादून : (मनीष वर्मा ) आज यू के डी द्वारा अधिवेशन की तिथि आगे एक्सटेंड करने एवं विशेषाधिकार समिति की घोषणा की गई है जिसे देख राजनीतिक दिग्गज एक बार फिर सोच में पढ़ गए है कि कही यह यू के डी की 2022 में सत्ता में वापसी का संकेत तो नहीं है ?
26 जुलाई 1979 को बिपिन चंद्र त्रिपाठी,प्रो देवी दत्त पंत,इंद्रमणि बडोनी ,काशी सिंह ऐरी ने नैनीताल में यू के डी को जन्म दिया दिया और इसकी विधिवत स्थापना की थी उस अधिवेशन की कुमाऊ विश्विद्यालय के अवकाश प्राप्त वाइस चांसलर विपिन चंद्र त्रिपाठी ने अध्यक्षता की थी और युवा नेता काशी सिंह ऐरी को पूरे प्रदेश में झंडा,डंडा उठाने और प्रचार प्रसार का जिम्मा दिया गया था और इसका उद्देश्य अलग पहाड़ी राज्य की स्थापना करना था ।
इनका सपना 9 नवंबर 2000 को पूरा भी हो गया जब उत्तराखंड एक अलग राज्य के रूप में प्रवत्त किया गया और इन सबकी मेहनत के फल स्वरूप जनता ने 4 विधायक भी यू के डी के 2002 के चुनाव में जीता दिए ।
हालंकि ऐसा नही की यू के डी के लोग नए राज्य के चुनाव में पहली बार जीते बल्कि इसके नेता बिपिन त्रिपाठी तत्कालीन उत्तर प्रदेश 1989 में विधायक भी रहे और 1993 में काशी सिंह ऐरी भी जीते वर्ष 2002 में उत्तराखंड की प्रथम विधान सभा में यू के डी के 4 विधायक जीत कर आए विपक्ष में बैठे वही 2007 के विधान सभा चुनाव में में यू के डी की एक सीट कम हों गई और 2012 के चुनाव में 2 सीट और कम हो गई और 2017 के चुनाव में यू के डी एक भी सीट नहीं ला पाई
एक बार भाजपा के साथ सत्ता में और एक बार कांग्रेस के साथ
यू के डी दो बार इस राज्य में सत्ता में आई एक बार भाजपा के साथ 2007 में और दूसरी बार कांग्रेस के साथ 2012 में सत्ता में रही और इसके विधायक मंत्री बने ।
दरअसल राज्य गठन के बाद यू के डी बहुत मजबूती के साथ उभरी थी और 70 में से 4 सीट लाकर सत्ता की धुरी का केंद्र बन गई थी क्योंकि सरकार बनाने को लेकर 36 बहुमत का आंकड़ा होता है और 4 सीट इसमें बहुत मायने रखती है पर धीरे धीरे यू के डी अपना अस्तित्व खोती चली गई और पार्टी के नेताओ के आपसी विवाद ,तू बड़ा और मैं बड़ा के चक्कर और अति महत्वकांक्षा होने के चलते पार्टी शनेः शनै अपनी पहचान खोती चली गई खासकर जब भाजपा और कांग्रेस को यह अंदेशा हो गया था की यदि इस पार्टी को नही रोका गया तो उनकी एक दिन छुट्टी हो सकती है इसलिए कुछ भाजपा और कांग्रेस के नेताओ को मिशन टूट फूट पर लगा कर यू के डी के पहले 2 फाड़ और फिर कई फाड़ करवा दिए गए और रही सही कसर भी पूरी कर पार्टी को अंततोगत्वा धरातल पर ला दिया गया ।
अब कुछ नया सा दिखता है
यू के डी के नेताओ को लगता है यू के डी की अब असली कीमत पता लग चुकी है क्योंकि शायद किसी ने जीवन में कभी नहीं सोचा था कि आम आदमी पार्टी दिल्ली में वर्षो से सत्ता में बैठी कांग्रेस,भाजपा के दिग्गजों को हराकर सरकार बनाएगी और एक बार नही दो दो बार भी सरकार बना कर सबको चौका देगी ,शायद छोटे राज्यों और क्षेत्रीय दलों की कीमत इसके नेताओ को भी अब समझ आ गई है ।
अब बात नई टीम की
आज जो नाम यू के डी की लिस्ट में दर्शाए गए उनमें काशी सिंह ऐरी ,दिवाकर भट्ट, बी डी रतूड़ी ,त्रिवेंद्र पंवार,नारायण सिंह जंतवाल,पुष्पेश त्रिपाठी ,जे पी जुयाल,चंद्र शेखर कापड़ी ,सुरेंद्र कुकरेती,हरीश पाठक के नाम वापस एक साथ दिखे जिन्हें देख राजनीतिक खिलाड़ियों और राजनीतिक गणना करने वालों को एक बार फिर यू के डी के बारे में सोचने को मजबूर कर दिया है ।
पहाड़ी हो या मैदानी सब बराबर हो ।
जैसे मुख्यमंत्री या प्रधान मंत्री सारी जनता के होते है वैसे ही सत्ता में बैठी सरकार,नेताओ, मंत्रियों को या समझना चाहिए कि वह अपवाद से दूरी बनाए रखे शायद यह भी एक गलती यू के डी की रही की उनकी मानसिकता और सोच पहाड़ी और मैदानी वाद की भी रही इसलिए जनता का पूरा भरोसा यू के डी जीतने में खरी नहीं उतर पाई ।
हालंकि जानकारों का कहना है कि यदि कालांतर से सीख लेकर भविष्य की राजनीति में सबको साथ लेकर चलने कि सोच के साथ यू के डी के नेता आगे चलेंगे तो यू के डी को इस सोच का फायदा हो सकता है और यह संदेश उनको बनाए रखना होगा । यू के डी के नेता अब तक यह भली भांति जान चुके होंगे कि उत्तराखंड के 13 जिलों में से 10 जिलों में ठाकुर बाहुल्य क्षेत्र पढ़ते है और मात्र 3 जिले ही ब्रह्मण बाहुल्य है और इसके हिसाब से ही भाजपा और कांग्रेस अपना कार्ड खेलते आए है और इसी के चलते ठाकुर मुख्यमंत्री लाया और प्रोजेक्ट किया जाता रहा है ।
हालाकि यू के डी की टीम के सभी नाम भी ब्राह्मण समाज से है और आगे क्या करना है ये यू के डी की इस टीम को खुद निर्णय लेना होगा ।