हाईकोर्ट ने उत्तराखंड सतर्कता विभाग को आरटीआई के तहत मांगी गई सूचना देने के आदेश

हल्द्वानी निवासी चंद्रशेखर करगेती ने प्रदेश के सतर्कता विभाग से आरटीआई के तहत चार बिंदुओं में जानकारी मांगी थी

हाईकोर्ट ने उत्तराखंड सतर्कता विभाग को आरटीआई  के तहत मांगी गई सूचना देने के आदेश दिए हैं। इसको लेकर सूचना आयुक्त के आदेश को सही ठहराया है और सतर्कता विभाग के लोक सूचना अधिकारी की याचिका को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद अब सतर्कता विभाग को भ्रष्ट और दागी अधिकारियों की सूची सार्वजनिक करनी होगी।  अदालत ने संबंधित मामले में सूचना देने के लिए अधिकतम छह सप्ताह का समय दिया है। न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई की। हल्द्वानी निवासी चंद्रशेखर करगेती ने प्रदेश के सतर्कता विभाग से आरटीआई के तहत चार बिंदुओं में जानकारी मांगी थी। इसमें ऐसे राजपत्रित अधिकारी जिनके खिलाफ जनता से शिकायत मिली है, कितने मामलों में जांच हुई है, वहीं जांच के बाद कार्रवाई तथा कितने मामलों में मुकदमे दर्ज होने की ब्योरा मांगा था। विभाग के लोक सूचना अधिकारी ने करगेती की मांगी गई जानकारी के आरटीआई के अधीन नहीं आने का जवाब दिया। इसकी अपील की गई लेकिन फिर भी सूचनाएं नहीं मिलीं। करगेती ने आयोग में इसकी शिकायत दर्ज कराई। सूचना आयोग ने संबंधित लोक सूचना अधिकारी को जानकारी देने के निर्देश दिए और कहा कि समय पर सूचना नहीं देने पर अगली सुनवाई में उनके खिलाफ जुर्माना भी लगाया जाएगा। सूचना आयोग के इस आदेश को लोक सूचना अधिकारी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।  इधर, करगेती की ओर के पैरवी कर रहे अधिवक्ता अजय सिंह बिष्ट ने कहा सतर्कता विभाग की स्थापना 1965 में भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए हुई है। आरटीआई धारा 24 (4) में साफ है कि भ्रष्टाचार  मामले में सूचना देने से इनकार नहीं किया जा सकता है।

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